शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

तुम्हारी यादें



आओ तुम्हारी यादों को,
                       थोड़ा सा सवांर  लूं,
जम गयी है धूल इनपे,
                    चलो  इसे बुहार लूं..........


समय की शिला के नीचे,
                      दबी हुई यादों को,
जीवन-संध्या की बेला मे,
                       फिर से निकाल लूं.........


जिन्दगी  की जद्दोजहद में; 
                         भूली उन यादों को,
फुर्सत के इन पलों में; 
                            ह्रदय में फिर पाल लूं........


चलते ही चलचित्र,
                   मानसपटल पर ,यादों का
मुरझाई उन आँखों में,
                     जीवनरस फिर से  डाल लूं .......


साथ बिताये उन लम्हों की,
                      सहेज कर रख थाती
स्मृति -पटल बंद करके, 
                          ताला उस पर डाल दूं ......


अनमोल तुम्हारी यादों का, 
                          कोई मोल नहीं जग में
इसलिए उन्हें अंतर्मन के,
                            उस कोने में ही डाल दूं ......






.........................डॉ..रागिनी..मिश्र ................................

6 टिप्‍पणियां:

  1. यादों का झरोखा बहुत ज़रूरी है इस जीवन में ...
    खूबसूरत रचना ...

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  2. खुशनुमा यादें यूँ झाड पोंछ कर व्यक्ति फिर सहेज कर रख लेता है .....खूबसूरत रचना

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  3. अनमोल तुम्हारी यादों का,
    कोई मोल नहीं जग में
    इसलिए उन्हें अंतर्मन के,
    उस कोने में ही डाल दूं ......

    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  4. आओ तुम्हारी यादों को,
    थोड़ा सा सवांर लूं,
    जम गयी है धूल इनपे,
    चलो इसे बुहार लूं..........

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