शनिवार, 11 अगस्त 2012

कुछ यूं भी



तुमसे बिछुड़कर शिकवा ना किया,

भरी महफ़िल में कभी रुसवा ना किया,


जब दर्द हुआ;  हँस-हँस के सहा ,

दुनियावालों से बस   यही कहा.....
.

"ये लोग क्यों किसी पे मरते हैं 

दिल में इतना दर्द क्यों भरते हैं  


की बाखुशी अपना क़त्ल करवाके 

इल्जाम भी खुद पे  ही धरते हैं "


ग़म खुद का छुपा मुस्कराए हैं 

हमने रिश्ते कुछ यूँ भी निभाए हैं ...........



.............रागिनी .....................

4 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्ते बने ही हैं निभाने को ...हँस कर या ढो कर ....निभाने तो हैं ही :))))

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  2. अपने क़त्ल का इलज़ाम खुद पर???
    शायराना दिल जो करे वो कम..

    सुन्दर!!!
    अनु

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