बुधवार, 4 जुलाई 2012

.'स्त्रियां और हास्य लेखन'

थोड़े दिनों पहले अपने ब्लॉगर मित्र श्री अमित कुमार श्रीवास्तव जी ने लिखा कि  'स्त्रियाँ हास्य--व्यंग्य क्यों नहीं लिखती हैं'........बात दीगर लगी .सोचा कुछ हँसी  का लिखा जाए।.....लिखा,, मिटाया,, फिर सोचा इसमें हँसी  तो आ ही नहीं रही है,.व्यंग्य भी नहीं दिख रहा है,....दिख रहा है तो सिर्फ कटाक्ष .....फिर सोचने लग पड़ी कि बात सत्य है 'ये हास्य कहाँ चला गया है हम स्त्रियों की जिन्दगी से?'......हम हँसते तो खूब जोर--जोर से हैं, महफ़िल गूँज जाती है, तो क्या सब बनावटीपन  है, अगर नहीं तो अमित जी के प्रश्न का उत्तर कहाँ है?
                                                 
                                                   जीवन की उठापटक जितना स्त्रियों को प्रभावित करती है उतना शायद पुरुषों को नहीं करती .....शादी के बाद से ही नए परिवेश को समझना,, उसमे ढ़लना,,नयी--नयी जिम्मेदारियों का निर्वहन,,नयी जिन्दगी को संवारना ......सब नया--नया ..स्त्री वह नहीं रह जाती  जो शादी के पहले रहती है...उसका वह चंचल मन एकदम स्थिर हो जाता है, उसका बेबाकपन शालीनता में तब्दील हो जाता है।....सब polished .....धीरे--धीरे यही उसका lifestyle  बन जाता है,सब उसका यही रूप पसंद करते हैं इसलिए  इसी बनावटीपन में वो सहज रहती है लेकिन वास्तविक सहजता गायब हो जाती है और एक मनुष्य की सहज अन्तर्निहित प्रवृत्ति का अंत हो जाता है, और चूँकि वह हर काम दिलो--जान से करती है,, इसीलिए  हास्य--लेखन नहीं कर पाती है।.....क्योंकि हँसना तो बिलकुल निर्झर की तरह है ......साफ़,,उन्मुक्त,,कल--कल,,कुल--कुल .......

शुक्रवार, 15 जून 2012

भाए आम मन को..... 'चोरी का'

                                      शीर्षक पढ़कर चौंकिए नहीं, बात सोलह आने सच्ची है ....अमूमन सबके साथ होता है, कोई share नहीं करता है ......मै कर रही हूँ ........................................................................
 समय आ गया है, आम बाज़ार का राजा बनकर छा चुका  है। तरह-तरह के आम  बाज़ार में अपनी पैठ बनाकर दिल को लुभा रहे हैं, .............लेकिन जो आम पडोसी के पेड़ पे लगा होता है उसे चुराकर खाने का आनंद ही कुछ और है, जो पेड़ सड़क के किनारे किसी के घर के बाहर  आम से लदा खड़ा होता है , कदम खुद-ब -खुद उस रास्ते चल पड़ते हैं।सुबह-सवेरे जबरदस्ती उन पेड़ों के नीचे होकर ही सैर पर निकलना और अचानक उन्ही पेड़ों के पास आकर जूते के फीतों का खुलना, झुककर  उन्हें बांधने  की जबरदस्ती की कवायद में गिरे हुए आम को यूँ उठाना ; मानों उसने आपकी walk में बाधा पहुंचाई।अगले ही पल उस आम का पाजामे की जेब में पहुंचना और फिर पूरा रास्ता मूंछों ही मूंछों में मुस्कराते हुए कटना .......घर में वापसी एक विजयी वीर की तरह करना और फिर उस आम को खाना ......यह आनंद बाज़ार से खरीदकर आम खाने में कहाँ?

                                             मेरी भी स्थिति आजकल यही हो रही है. बाज़ार से खरीदकर क्यों खाऊ; जबकि पीछे के घरवालों के पेड़ की पूरी एक डाल मेरे घर की छत पर पूरे साल आराम करती है. तो आम के मौसम में मेरा पूरा हक़ बनता है उस डाल को झकझोर कर जगाने का।.....हाय! क्या स्वाद होता है उस कच्चे-पक्के आम को पडोसी से चुरा-चुराकर खाने का ........इस भरी गर्मी में,तपती दुपहरी में,गर्मी की छुट्टी में  मोहतरमा 'रागिनी मिश्रा' को अपने ठन्डे कमरे के अलावा  घर की छत पर भाग-भाग कर जाना भी खूब भाता है .....पूरी कोशिश यही होती है कहीं बाहर घूमने  जाने से पहले सारे  आम पेट में पहुँच जाए वरना बाहर जाकर भी वोह आम बिछड़े प्रियतम की तरह रातों  की नींद उडाता रहता है.........
                                                  
                                             dinner के बाद walk  करना कम आम ताड़ने का कार्यक्रम ज्यादा चलता है। अच्छा..........ये आम चार दिन में पक कर  गिर जायेगा और उसके पहले अगर घर के मालिक ने तोड़ लिया तो! नहीं........इसे  हमने तड़ा  है और हम ही इसी तोड़ेंगे. फिर तडके तीन बजे उठकर डंडा-हसिया उठा 'चला मुरारी हीरो बनने' वाला plan  शुरू हो जाता है और तीन-चार; जितने भी धडकते दिल से आम तोड़ पाए; तोड़े और फिर बिस्तर से उठे सुबह आठ बजे के बाद। और फिर जो अपनी बहादुरी  के किस्से सुनाये तो बस्स!!!  तरह-तरह के आम बाज़ार से खरीदकर भी आते हैं लेकिन सच्ची बताये;; जो इस तरह से आम खाए हैं या खा रहे हैं उस स्वाद का कोई मुकाबला है ही नहीं.........भाए आम मन को चोरी का ......देखिये मैंने इस पूरे लेख को भी आम सा रंगीन बना दिया है यानि पूर्णरूपेण 'आम्मयी रचना'.............

रविवार, 22 अप्रैल 2012

कहाँ खो गयी???

कहाँ खो गयी...
वह लहक ,
वह महक ,
वह चहक ,
वह चमक,
वह ललक,
और;
वह झलक
कहाँ खो गयी?




जीवन-मरू में,
रह गयी है...
बस ख़ामोशी,
और तुम्हारी;
वह सरगोशी.
भूल गयी....
वह मदहोशी,
ख़त्म हो गयी;
अब  बेहोशी.




जीवन में अब 
बस बची है,
तुम्हारी प्रतीक्षा;
और तुमसे
प्रीत के 
बोलों की 
वही 
पुरानी,
अपेक्षा..........

रविवार, 8 अप्रैल 2012

'सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा:सुधार हेतु सुझाव'

facebook  पर बहुत दिनों से एक message  flash   हो रहा है कि, 'हम नौकरी तो सरकारी चाहते हैं लेकिन अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहते हैं'......क्यों? सवाल  अत्यंत  विचारणीय है ........और जवाब एक ही है, 'हम सरकारी कर्मचारियों का एक standard  है, लेकिन सरकारी विद्यालय उस मानक पर खरे  नहीं उतरते हैं...


ज्यादा पुरानी बात नहीं है, आज से लगभग १५ साल पहले तक सरकारी विद्यालयों की स्थिति इतनी बुरी नहीं थी, लोगों के विचार थे कि जितने भी IAS ,IPS ,PCS अधिकारी हैं, सब सरकारी विद्यालयों से ही पढ़कर बने हैं, हाँलाकि; ये धारणा आज भी कायम है..... फिर; कारण क्या है? हम क्यों नहीं पढ़ाते अपने बच्चों को वहां? क्या private schools  में teachers  ज्यादा qualified  हैं? नहीं....ऐसा कुछ भी नहीं है....जो स्तर teachers  का govt .colleges  में है वह private  में कहीं नज़र भी नहीं आता..हाँ! यदि कुछ नज़र आता है तो वह है वहां का hardwork ,अच्छी सी बिल्डिंग, glamour और इंग्लिश....इसके अलावा guardians  को भाता है.....जितनी ज्यादा फीस उतना अच्छा स्कूल, जितना ज्यादा स्कूल का टाइम उतना अच्छा ही वह स्कूल,और फिर swimming ,games ,और summer camps .....अब ये धारणा मनो-मस्तिष्क पर काफी गहरे पैठ चुकी है, और हर समर्थ अविभावक ज्यादा फीस और भीड़ वाले स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करवाना चाहते हैं.....


अभी हम समझ नहीं रहे हैं कि यदि इन प्राइवेट schools  की कुक्कुर्मुत्ता पैदावार को नहीं रोका गया तो इसके क्या भयंकर परिणाम हमारी आगे आने वाली पीढ़ी को भुगतने  पड़ेंगे .....आज एक बच्चे की पढाई यदि शहर के किसी अच्छे {अविभावक की दृष्टि में} प्राइवेट स्कूल में करवाई जाती है तो कम-से-कम एक लाख रूपया सालाना लगता है ...यदि किसी के दो बच्चे हैं तो दो लाख और यदि उसकी सालाना कमाई पांच लाख रूपए है तो उसे दो लाख में अपना घर चलाना है और एक लाख रूपया भविष्य के लिए बचकर रखना है यदि उसे अपने बच्चो को आगे डॉक्टर,इंजीनियर या फिर MBA  कराना है....यानि शादी करने के बाद से उसे अपने बच्चों के लिए ही जीना है...वरना? और अगर इतनी कमाई में सब संभव नहीं है और आकान्छाएं ज्यादा  हैं तो लाख कोशिशों के बाद भी इस देश से भ्रष्टाचार और घूसखोरी नहीं ख़तम हो सकती....सरकार तो यही चाहती है कि ऐसे schools  और ज्यादा तादात में खुलते ही रहें क्योंकि यहाँ उसकी कमाई है...


तो फिर; क्या हो? इस बढ़ते हुए  शिक्षा के खेल में कैसे सही ढंग दुबारा लाया जाए? कैसे फिर से सरकारी विद्यालयों की पढाई का स्तर सुधारा जाए? मेरी नज़र में इसका एक तरीका है; वह यह कि सरकार यह नियम बना दे कि "  हर सरकारी कर्मचारी का बच्चा सरकारी स्कूल में ही पढ़ेगा".......आप देखिएगा उसी दिन से सभी सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता अपने आप ही अभूतपूर्व ढंग से सुधर जाएगी....जब शिक्षा-विभाग के आला अधिकारियों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढने जायेगे तो वह दिन दूर नहीं कि सरकार को और अधिक विद्यालय खोलने पड़ जायेंगे और वापस लौटेगा सरकारी विद्यालयों की वही पुरानी शान ............जहाँ से पढ़ा हुआ बच्चा ही आज ज्यादातर अधिकारी की कुर्सी को सुशोभित कर रहा है.... 










sarkar

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

'आओ खेलें भ्रष्ट-भ्रष्ट'

चलो आज नेता बन जाएँ 
फिर इस देश की बैंड बजाएँ;
सबको कर दें त्रस्त-त्रस्त
'आओ खेलें भ्रष्ट-भ्रष्ट'....


एक घोटाला तुम करो 
फिर एक घोटाला मैं करूं;
अखबारों में छपे सुर्खियाँ 
see -saw see -saw हम करें....


कसम खाएँ माँ-बाप की
एक 'प्रेस कांफ्रेंस' करें;
खेल चले बराबर का 
मिल-बाँट रुपैया हजम करें....


मढ़कर दोष किसी माथे पर
अपनी छवि उजली बनवाकर ;
कितने ही murder करवाकर 
कर दें सब कुछ अस्त-व्यस्त.....


देश का करके बंटाधार
खुद ही बन जाएँ कर्णधार;
हम तो हो जाएँ मस्त-मस्त
आओ; फिर खेलें भ्रष्ट-भ्रष्ट.....







रविवार, 11 मार्च 2012

"r u there "?......

मेरे inbox  में पड़ा तुम्हारा सन्देश.......
'क्या हुआ
r  u there "?.....
"where r u ????????"
आज मुझे चिढ़ा रहा है,
खूब रुला रहा है,
जितनी पीड़ा ताउम्र  नहीं मिली,
उससे ज्यादा आज तड़प
एक पल में पा ली....
जीवन भर न मिट पानेवाली
ग्लानि पा ली.....


मैं रुक न सकी दो पल,
और तुम इतनी आगे निकल गए...
मेरे उत्तर की प्रतीक्षा भी न कर सके?
मेरा जवाब तो सुन लेते,
जाते-जाते कुछ तो कह जाते .
आज बार-बार मैं msg कर रही हूँ..
'क्या हुआ, r u there ?'
कोई जवाब नहीं...
अब; कभी कोई जवाब नहीं...
जीवन भर पूछती ही रह जाऊँगी
पर अब कभी कोई जवाब न पाऊँगी 
क्यों न इंतज़ार कर सकी उस पल
और अब इंतज़ार हर पल
अविराम........



शनिवार, 3 मार्च 2012

आई होली आई!


लो आ गयी होली,
फिर से छा गयी होली...
मतवाली बयारों संग,
मन को भा गयी होली...


लाल-गुलाबी-नीला-पीला,
रंग उड़े है चारों ओर....
नाचे बाबा देवर बन के,  
देखो नाचे जैसे  मोर ...


खाके गुझिया चढ़ाकर भंग,
देखो डाले सबपे रंग..........
होली के हुल्लारे में, 
भीगा सबका मन और अंग .....




ना कोई बैर, ना कोई दुश्मन,
भूले हर कोई अपना गम...
लग जाएँ गले एक-दूजे के, 
छाए ऐसे होली हरदम.........


अबकी रंग लगाना सबको ऐसा,
कोई और न रंगत छाए,
मतलब से भरी इस दुनिया में
बस प्यार का रंग रह जाए......