शनिवार, 14 मई 2011

स्पर्श

स्पर्श ............
कौन सा प्रथम?
मन का या
तन का?

 

ये तो नहीं जानती
पर 
जो ............
छू जाए,
वही ..........
प्रथम,
अंतिम,
जीवन-पर्यंत
और
मरणोपरांत भी............

रविवार, 8 मई 2011

"माँ!.....मुझे तुमसे कुछ कहना है"

 सुबह से लोगों के सन्देश आ रहे हैं......"हैप्पी मदर्स डे"...........अभी तक मैंने किसी को भी जवाब नहीं दिया है और न ही अपनी माँ को बधाई दी है.......और न ही दूँगी.इसलिए नहीं कि उससे प्यार नहीं करती बल्कि इसलिए कि; सिर्फ एक दिन  ही माँ के नाम नहीं करना चाहती, बल्कि जितने दिन मैं इस धरती पर साँस ले रही हूँ उतने दिन उसके नाम ..... इसलिए बधाई देकर उसके नाम के असीमित दिनों को सीमा में नहीं बांधना चाहती.
                                लेकिन आज तुमसे कुछ पुराना,दबा हुआ दर्द बताना चाहती हूँ....जो जीवन के चालीस वर्ष पूरे करने और दो बच्चों की माँ बनने के उपरांत भी कह न सकी...."छह दिसंबर सन उनीस सौ सत्तर....मेरे जन्म के छह माह के बाद ही तुमने मुझे "बाबा-दादी" के पास पालने के लिए इलाहाबाद छोड़ दिया ...."क्यों"? जबकि दीदी और भैया तुम्हारे प्यार भरे आँचल तले पले...थोड़ा सा होश संभाला तो हमेशा तुम्हारे साथ लखनऊ आने वाली ट्रेन में अपनी छोटी सी संदूकची लेकर बैठ जाती लेकिन तुम जानबूझकर हमेशा रात १०.४० वाली ट्रेन से जाती...मैं अबोध ट्रेन में ही सो जाती और सुबह खुद को इलाहाबाद के अपने खटोले पर ही पाती..थोड़ा सा रोती और फिर बाबा के दिए 'लड्डू-बर्फी' और अम्मा  के लड़ियाने में सब भूल जाती. फिर बाबा कहते 'चलो अपने मम्मी-पापा को चिट्ठी लिखकर बोलो कि तुम्हे लेकर क्यों नहीं गए'? तुम जवाब देती कि "तुम्हें अम्मा-बाबा लाने ही नहीं देते"......मैं कुछ समझ न पाती लेकिन शाम को बाबा के साथ लोकनाथ की चाट,रबरी और फ्रूट-आइसक्रीम खाकर मस्त हो जाती और बाबा के समझाने पर समझ भी जाती  कि 'चलो दीदी-भैया को ये सुख कहाँ नसीब'......बहुत सेवा करती थी अम्मा-बाबा की.हाँ! पूरे घर की जान थी मैं. बहुत गर्व था बाबा को मुझपर.
                                          जब कभी मेरा तुम्हारे पास आना होता तो हमेशा तुम्हारी आँखों में मेरे लिए एक "स्पेशल ट्रीटमेंट' का भाव होता..क्यों? मैं उस सहज प्यार से तब भी  वंचित ही रह जाती;जो दीदी और भैया  को मिलता था....पूछने पर तुमसे जवाब मिलता "कल को तुम फिर अपने घर अपनी अम्मा के पास चली जाओगी".........और अम्मा से इसी प्रश्न का ये जवाब मिलता कि "बिटिया तुम कभी-कभी ही अपने घर जाती हो न इसीलिए तुम पर  विशेष ध्यान दिया जाता है"......मैं कभी किसी से न कह पाती कि मुझे कहीं से कुछ भी विशेष नहीं चाहिए .....अम्मा! न तुमसे और मम्मी! न तुमसे.
                                        पढ़ने में शुरू से ही तेज,बात-चीत में सबको आकर्षित कर लेने वाली,किसी भी तर्क में सबको पछाड़ देने वाली,घर के काम-काज में निपुण होती चली गयी..अम्मा ने मुझे बहुत कायदे से सब कुछ सिखाया लेकिन मम्मी! वो कभी मेरे दुखी होने पर रोओई नहीं, मेरे बालों पे प्यार से हाँथ नहीं फिराया.....जबकि तुम सब कुछ दीदी और भैया के साथ करती थी.मुझे हमेशा अकल दी गयी,सुविधा मुहैया कराई गयी, किसी भी समय कुछ भी मांगने पर पूरा  किया गया..........लेकिन नहीं मिला तो तुम्हारा प्यार भरा आँचल.....
                                         समय बीतने पर शादी के बाद विवेक के प्यार ने जीवन की रिक्तता को भर दिया...शिवा के जनम के बाद तो मानों मैं इस दुनिया की सबसे खुशनसीब "माँ" बनी लेकिन "शौर्य" के जनम के बाद नौकरी,घर और दो-दो बच्चों को पालने में जो मशक्कत झेली तो अतीत के तुम्हारे मुझे न रख पाने के दर्द को महसूस कर सकी ....उस दिन तुमसे कोई भी शिकायत न रही..डेढ़ साल तुम्हारे पास ही शौर्य को रखा और शायद मन को सुकून हुआ....लेकिन फिर अपने बचपन के भाव को याद करके ही उसे तुम्हारे पास से वापस ले आई .....अब तुमसे  कोई शिकायत नहीं है. अब सिर्फ एक याचना तुमसे और उस परम पिता परमेश्वर से है............जब-जब, जो-जो जनम मिले; माँ के रूप में तुम ही मिलो....क्योंकि मुझे अपने हिस्से का सारा प्यार चाहिए और एक संतान के रूप में मैं  भी तुम्हें वह सुख दे सकूं जो तुम्हें मेरे द्वारा मिलने चाहिए थे.................बस और कुछ नहीं कहना है मुझे  तुमसे.

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

मेरे लिये

नशे की वजह हो तुम मेरे लिए,

नशे की दवा भी तुम मेरे लिए....


              {१}

रात भी तुम,  दिन भी तुम,

और दिन का आतप भी तुम,

ग़र धूप हो तुम;तो घनी धूप में,

सघन छाँव भी तुम मेरे लिए....


                {२}

क्या कहूं कि क्या-क्या हो तुम,

ग़र हो तुम मेरे लिए तप्त मन;तो,

जीवन-मरू के इस तपते मन में,

शीतल चन्दन भी तुम मेरे लिए..... 


मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

सिर्फ तुम से

 {१}

ग़लती ना होते हुए भी,

इलज़ाम लगाया तुमने;

और हर बात पे;बिन बात पे

मुझको रुलाया तुमने ....


हम तो सब भूल गए थे,

तेरी मुहब्बत के साए में;

पर ना जाने कौन सा ,

ये बदला चुकाया तुमने....

          {२}

अब तो उन हालातों पे भी 

रोना आ जाता है मुझको,

तेरे बानक से; तकदीर ने 

जो-जो दिखाया मुझको....



फिर से दे दे अपना हाथ;

तू खुद ही हाथों में मुझको,

कि, संग तेरे जिंदगी में;

आगे चलना है मुझको....


           {३}

जिंदगी की उदास  राहों से;

चुन लूंगी सारे गम के कांटे,

मैं तो  तेरी हर  राह  में, फूल 

बिछाने  की बात करती हूँ ....


जिंदगी में ना होगा कोई;

दर्द  ना  ग़म ना बेईमानी,

और  ना ही  कोई शिकायत 

तहेदिल से ये वादा करती हूँ ....

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

Parivartan

Jeevan mein jab kabhi parivartan aana hota hai, toh Prabhu hame pehle hi uske baare mein ingit kar deta hai. woh hame kisi na kisi madhyam se aane wale samay k liye paripakwa karta hai, phir chaahe uske liye woh koi bhi raasta chune.........sahi hi hota hai. Bahot saare log aksar kuchch karne{jo saamajik drishti se anuchit ho} ke baad usko apni galti maante hain............yeh uchit nahi hai. Hamen us kritya ke nihitaarth ko dekhna chaahiye. Aksar jo siksha hamen maa-baap, bhai-behan,pati-patni aur gurujanon se nahin mil paati hai woh kisi anya maadhyam se milti hai ya phir paristithi sikha deti hai. Kuchch log ise ' raaste ke hamsafar'  hone ka naam dete hain.........yeh nitant ghatiya hai lekin wartmaan samay mein ise 'practical approach' kehte hain..............jab hamhari zindgi mein koi shamil ho gaya toh ho gaya........phir chaahe woh guru ho,mitra ho ya shatru.
                                                         Hamen sada aane wale samay ka swagat karna chahiye.............achcha ya bura.........woh samay hamari apni kismat ka hota hai , haan! achcha samay samapt jaldi ho jaata hai aur bura bitaye nahi beetta lekin jo niyati mein likh diya gaya hai usko agar sahajta se sweekaar kar len toh hi aage badhne mein safal honge anyatha pareshaan hote rahenge.
                                                         Ek baat...........jo hum hamesha padhte,sunte chale aa rahen hain ki............'yadi koi dil k kareeb ho toh usko apne se door nahin jaane dena chahiye'...........ekdum theek hai lekin ho sakta hai paas rakhne se woh door ho jaaye.Aisa sabke jeevan mein hota hai hum niyati ke virudh jaakar agar kuchch pana chahten hain toh dukh hi prapt hota hai. Isliye hamesha sahi samay per kaarya kar lena chahiye, kyonki..............................mai wohi aur tu wohi,lekin samay raha ab woh nahin. Samay se jyada nishthur aur kathor koi nahin.Woh apni upeksha ka badla leta awashya hai.
                                                        

प्रेम

मानव जीवन में प्रेम का अत्यंत महत्वपूर्ण है . वह प्रेम के बिना अपना जीवन नहीं व्यतीत कर सकता है .किसी के जीवन में ये कम और किसी के जीवन में अधिक होता है .जिनके जीवन में ये कम होता है ,वह अक्सर  नकारात्मक वृतियों से घिरे रहतें हैं एवं  दूसरों के खुशहाल  जीवन को देखकर ईर्ष्या की अग्नि में जलते रहते हैं .प्रेम एक ऐसा भाव है जो मनुष्य को 'इंसान'बनाने में सहायक होता है .परन्तु जीवन में ये भाव उसी व्यक्ति में होता है जो स्वयं से प्रेम करता है ,जो स्वयं से प्रेम करता है वो समस्त प्राणियों ,प्रकृति से प्रेम कर सकता है .यह एक    सहज भाव है .बहुत सारे व्यक्ति अक्सर यह कहते मिल जाते हैं कि प्रेम जीवन को बर्बाद कर देता है, ऐसा वो सोचते हैं जो बीमार मानसिकता के होते हैं और जिनके लिए प्रेम मात्र शारीरिक आकर्षण होता है .जहाँ प्रेम मन से आरम्भ होता है वहां तो मन के साथ शरीर का मिलना एक सहज प्रक्रिया होती है और तभी प्रेम अपने पूर्ण रूप में
प्रदर्शित होता है.  यह  प्रेम किन्ही दो व्यक्तियों  के मध्य का समीकरण होता है . यही समीकरण व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से प्रेम करने के  लिए प्रेरित करता है और यहीं से आरम्भ होती है 'वसुधैव कुटुम्बकम' की अवधारणा ..

एकाकीपन ( एक सकारात्मक चिंतन )

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है . उसे रहने  और पनपने के लिए एक वातावरण की आवश्यकता होती है . बिना संगी-साथी के उसे अपना जीवन रिक्त प्रतीत होता है, और यह रिक्तता कभी-कभी उसे हीन भावना से भी भर देती है .वह भटक उठता है किसी मित्र की तलाश में . पर यह आवश्यक नहीं है कि उसे वह मिल ही जाए या फिर जो मिले उससे उसके मन के तार जुड़ ही जाएँ और वह इस अकेलेपन की दुनिया से बाहर आ सके.
इसलिए यदि हो सके तो उसे उस अकेलेपन का सम्पूर्ण सदुपयोग करना चाहिए .मनुष्य अपने जीवन में कई ऐसे अपनी रूचि के काम करना चाहता है जिनको वह समय और परिस्तिथियोंवश नहीं कर पाता है. उन सभी कार्यों को अपने अकेलेपन का साथी बनाकर वह जीवन में "परफेक्ट" बन सकता है और अपने आप से खुश और संतुष्ट हो सकता है.
हमारे मन का वह कोना जो नितांत निजी होता है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ हम उसमे झांकना भूल जाते हैं....अपनी जिम्मेदारिओं का लबादा ओढ़े हम अपने अलावा सबके पास होते हैं . समय बढ़ने के साथ जब वह सब हमसे दूर हो जाते हैं तो हमारा नकारात्मक भाव से ग्रस्त हो जाना स्वाभाविक ही है .
वर्ष भर हर तीज-त्यौहार में हम अपने घर का कोना-कोना साफ़ करते हैं और कामना करते हैं कि घर में खुशहाली रहे .फिर.....
मन का वह कोना ,अपना कोना...... क्या हमें समय-समय पर साफ़ नहीं करना चाहिए? अवश्य करना चाहिए.....क्योंकि हमारी उत्पत्ति एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में हुयी है ...अतः अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए यदि अपने व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास किया जाए मनुष्य ना केवल सदेव खुशहाल जीवन जियेगा बल्कि कई ऐसी कलाएं सीखेगा कि अकेलापन उसको कभी काटने नहीं दौड़ेगा ......और अंत में वह मृत्यु भी सुखद ही प्राप्त करेगा क्योंकि अपूर्णता व्यक्ति को अंतिम समय में भी सताती है.
अतः हम सबको अपने मन के उस कोने क़ी आवाज़ को अकेले में सुनना है और सुनकर समय का सही उपयोग करने निकल पड़ना है और सच में तभी सार्थक एवं पूर्ण होगा हमारा ............'अस्तित्व'