सोमवार, 26 जनवरी 2015

अरे फेसबुक,ट्विटर, ब्लॉगजगत
 के बुद्धिजीवियों!
अपनी ईर्ष्या के चलते अपने लहँगे से तो अपना मुँह ना ढाँपो। कल सारे दिन एक न्यूज़ चैनेल fb पर भी चलता रहा। मेरे पुरुष मित्र तो अपनी गरिमा में रहे लेकिन कुछ महिला मित्रों ने अपनी नफरत की आग में जलते हुए वो मोर्चा खोला कि अपनी देश की गरिमा, संस्कृति (अतिथि देवो भव) और देश प्रेम तक को ताक पर रख दिया। 'मोदी ने चाय बनाई', 'वो गले मिले', 'मोदी पत्नी के साथ नहीं', 'उन्होंने कुर्ता नहीं पहना', 'आगरा चैन में', '26 जनवरी को झमाझम बारिश हो जाए', 'क्या मंदिर जाएंगे'.............और भी जाने क्या क्या और उन स्टेटस पर कमेन्ट भी आये जलकुकड़े लोगों के ही।  यह बात पाकिस्तान या चीन के लोग कहें तो जायज़ है लेकिन जब हिन्दुस्तानी ही यह सोचने लगें कि आज बारिश हो जाए और गणतंत्र दिवस का सारा कार्यक्रम सत्यानाश हो जाए तो यह वाकई सोचनीय स्थिति है। यह बात भी सब लोगों को पता है कि हमारे यहाँ मेहमान जान से भी प्यारा होता है  लेकिन क्या करें? …… कांग्रेसी शासनकाल में पता थी लेकिन अब तो जलते जलते बुद्धि भी जल गयी है.…। सोचने समझने की ताकत सब मोदी में लगा दी है। अच्छा! उस पर कमाल यह कि,एक बुज़ुर्गवार ने 15  अगस्त के लिए कहा था  ''अब कल हम लॉन्ग ड्राइव पर चले जाएंगे। … कौन देखेगा लालकिला?'' लेकिन चिपके टीवी से ही रहें और लगातार updates देते रहे।  इस सरकार के आने के बाद सूखा पड़ा तो मेरे एक मित्र ने लिखा, 'वाह प्रभु! तुम भी विरोध में, मस्त'' ……  अरे दोस्तों! देश हमारा है , इसका बारिश सूखा हम सबको प्रभावित करेगा। राजनीतिक नफ़रत छोड़ो, प्रेम से रहो और गणतन्त्र दिवस की बधाई  स्वीकार करो। मैं  चली अपने विद्यालय के प्यारे प्यारे बच्चों के पास क्योंकि लाख तूफान आये, वो उतनी ही गर्मजोशी के साथ अपने देश का गणतंत्र दिवस मनायेंगे जितनी गर्मजोशी से एक भारतीय को मनाना चाहिये …'चाहे सरकार किसी भी पार्टी हो' ……''जय हिन्द''                                                      

शनिवार, 1 नवंबर 2014

नारी प्रेम का पर्याय है, षड्यंत्रों का नहीं ......

नारी प्रेम का पर्याय है, षड्यंत्रों का नहीं ......
हाँ! मुझे ऐतराज़ है पाकिस्तानी सीरियल्स पर।

बड़े दिनों से 'ज़िंदगी' चैनल का शोर,   विशेष रूप से महिलाओं में हो रहा है। हम भी पिछले  कुछ महीनों से देख रहे हैं।  अच्छे कुर्ते, सादा लिबास, मेक-अप विहीन चेहरे, कम एपिसोड …… सब अच्छा। मार्केट में बहार आ गयी पाकिस्तानी कुर्तों की।  लेकिन ……, क्या किसी ने इन सीरियल्स के मूल पर गौर किया? आपने कहा कि, हमारे आस -पास की कथावस्तु लगती है। अपना सा लगता है।  .... जी नहीं ! मैंने तो स्त्रियों का इतना षड्यंत्रकारी रूप अपने आसपास नहीं देखा।  मेरी अम्मा, मम्मी, बुआ, चाची, दीदी, भाभी, सहेली, गुरुजन, पड़ोस की आंटी, दादी , सभी प्रेम से भरे हुए ही दिखे। अच्छी सलाह देनेवाले, घर को संभालकर चलने की सीख देनेवाले।  यहाँ तक कि, मेरे मायके के घर का पड़ोस ही एक नेक मुस्लिम परिवार का है। उस दीवार के पार से भी कभी ऐसा माहौल नहीं देखने को मिला कि एक माँ ही अपने बेटे के घर को उजाड़ने के लिए किसी और औरत के साथ मिलकर चाल चले। एक बात और , यहाँ मर्द भी इतना कान का कच्चा कि जो  औरत  उसके लिए अपने माँ-बाप का घर छोड़कर, उसके सहारे ही आई हो उसके चरित्र पर बड़ी ही आसानी से लाँछन लगाकर आधी रात में घर से निकाल दे..... हद है कि, हमारी बहनें इसे पसंद कर रही हैं।
मैंने अब तक तीन सीरियल्स देखे और तीनों में पति अपनी पत्नी पर विश्वास ना करके सीधे तलाक दे देता है , उसे घर से निकाल देता है।  हद है। .... दूसरी औरत मुस्कराती रहती है और जिसकी कोई गलती नहीं वह आँसूं बहाती रहती है।
वैसे ही स्त्री चरित्र पर लाँछन लगाना इस पुरुष -प्रधान समाज का प्रिय शगल रहा है और उस पर अब आपका समर्थन।  गलत सन्देश जाएगा।
कहाँ गयीं स्त्री अस्मिता का  मोर्चा संभालने वाली आवाज़ें? अभी कोई पुरुष इन्ही सीरियल्स के आधार पर किसी स्त्री के चरित्र पर लाँछन लगाये या  स्त्री को चालबाज़ कहे, वह किसी भी माँ बहन  को  सहन नहीं होगा तो फिर सिर्फ मनोरंजन के लिये समाज का गलत रूप प्रस्तुत करने वाले सीरियल्स की इतनी हिमायत अब मुझे अखर रही है।

जहाँ तक भाषा का प्रश्न है, उर्दू एक खूबसूरत और मीठी ज़ुबान है। मेरे बाबा को  हिंदी, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी, इन चारों पर सामान अधिकार था और इसीलिए हम सभी भाई- बहन, बुआ- चाचा  और पापा को इन चारों ही भाषाओँ को समझना, बोलना , लिखना और पढ़ना आता है।  बहुत उर्दू साहित्य भी पढ़ा है,  शायद इसीलिए मुस्लिम समाज का इतना गलत चित्रण तीन महीने बाद ही झेलना मुश्किल है.....
अपने यहाँ और उनके यहाँ सीरियल्स में पुरुष और स्त्री की जिस मानसिकता के दर्शन कराये जा रहे हैं, उसे दूर से ही प्रणाम। मनोरंजन के लिए कभी -कभी कोई अच्छी मूवी देख ली जाए, वह ठीक है पर रोज रोज उस कुत्सित और रुग्ण मानसिकता को देखना कि अपने स्त्री होने पर दुःख हो,  ……इस पर मुझे ऐतराज़ है.…।

                                                         डॉ रागिनी मिश्र


शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

'अंतर्राष्ट्र्रीय बालिका शिशु' दिवस और 'करवा- चौथ'

आज  'अंतर्राष्ट्र्रीय बालिका शिशु'  दिवस है  और संयोग से भारतीय स्त्रियों के सुहाग का पर्व  'करवा- चौथ'  भी है।  मैं दोनों के विषय में कुछ भी नहीं कहना चाह रही, बस एक संयोग बताना चाह  रही हूँ , वह भी विशेष रूप से स्त्रियों को।  लड़कियों के घर में रहने से घर गुलज़ार रहता है.… हर तरफ एक सकारात्मक माहौल रहता है। खास तौर से जब भी कोई तीज - त्यौहार पड़ता है तो घर में उसका विशेष उत्साह लड़कियों से ही होता है.…।

मुझे बहुत ही अच्छी तरह याद है कि जब तक 'अम्मा' (दादी) के पास रही, कभी भी उन्हें करवा या तीज पर बहुत काम नहीं करने देती थी।  यद्यपि छोटी बच्ची ही थी लेकिन यथासम्भव अपने नन्हें नन्हें हाँथों से उनकी मदद कराया करती थी।  वह मना  भी करती , लेकिन मैं कहती, ''नहीं अम्मा ! तुम थक जहियो, हमका करे देयो", …। अपने स्कूल से मेंहदी की पत्तियों को एक दिन पहले ही तोड़ लाती थी धोकर उसे सिल पर पीसती भी थी और थक भी जाती थी लेकिन उत्साह बरकरार रहता था फिर रात में जबरदस्ती सींक से अम्मा की हथेली पर गमला, सूरज, फूल और जाने क्या चील बिलौआ बना देती थी , सुबह वह  सबको दिखाते हुए घूमती थी, ''बिटिया लगाइस है''.... उनके साथ बैठकर शाम भर कद्दू , घुइयाँ , कढ़ी, फरा, खीर ,दही बड़ा सब बनवाती थी फिर 6 बजे से ही उनके पीछे पड़  जाती थी ,'' अम्मा तैयार हो'' , मेरी अम्मा बहुत ही गोरी चिट्टी सुन्दर सी थीं , लम्बे सफ़ेद बाल में चुटीला लगाती थी, हमेशा नारंगी सिन्दूर और राल लगाकर प्लास्टिक की बड़ी सी टिकुली, आँखों  में ताजा पारा काजल। वह हमेशा पीली साड़ी पहनकर पूजा करती थीं.। उस दिन वह विशेष रूप से मोटी मोटी  पाजेब, चौड़ी सी कमरपेटी,  बड़ी सी नथ और हांथों में ठंसी सी लाल चूड़ियाँ पहनती थीं।  उनका वह रूप मेरी आँखों में आज भी सजीव है।  भागकर उनका गड़ुवा छत पर रख आती, उल्टा सीधा चौक भी पूर आती , दिया जलाए मैं चाँद का इन्तजार करती ताकि मेरी अम्मा जल्दी से अर्घ्य देकर पानी पी लें।  उनकी सुनाई सारी  कहानियाँ मुझे उन्ही के बोलों में आज तक स्मरण हैं। वह हमेशा कहा करती थी ,'' कल का जब परारे घर चली जहियो तो ई सब को करी ?''

जब अम्मा के बाद लखनऊ अपनी मम्मी के पास आई तो बड़ी हो चुकी थी।  व्रत में मम्मी को पूरा आराम देती थी कि कहीं उन्हें कोई तकलीफ ना हो जाए।  दीदी  और मैं उनके साथ खाना बनवाते  , पूजा की तैयारी  करवाते  , उन्हें सजाते , उनके लिए फूलों का गजरा अपने हाँथो से बनाते  और उनका सुन्दर रूप निहारते। और मेरा वही काम, उसी तरह छत पर भाग भागकर सारा सामान रख आना और उचक उचक कर चाँद को ढूँढना। अम्मा वाली कहानियाँ मैं मम्मी को सुनाया करती थी। पूरा घर चहकता रहता।

आज अपने पति के लिए पूरे मन से व्रत करती हूँ।  सारे विधि -विधानों के साथ.…। सारे पकवान बनते हैं, साज श्रृंगार शायद उससे ज्यादा होता है,  लेकिन यहाँ खुले मन से स्वीकार कर रही हूँ कि वह चहक, वह उत्साह, उस प्रफुल्लित घर के  वातावरण का सर्वथा अभाव है क्यूंकि मेरे दो प्यारे बेटे हैं , बेटियाँ  नहीं। एक बेटी माँ के लिए क्या होती है, ये किसी भी स्त्री को बताने की बात नहीं है.… ये एक बंधन है प्यार का। तो आज का यह दिन सभी प्यारी प्यारी बच्चियों के नाम.… और मेरी सभी बहनों और माताओं को करवा चौथ की ढेर सारी बधाई और शुभकामनायें।
                                                      'डॉ रागिनी मिश्र '

रविवार, 17 अगस्त 2014

जन्मदिन मुबारक हो 'नागरजी



आज गंगा जमुनी संस्कृति के पोषक, अवध की अनमोल धरोहर और शहर-ए-लखनऊ की शान महान साहित्यकार  'पं.अमृतलाल नागर' जी की ९९वीं  जयंती है।  नागर जी के दर्शन का सौभाग्य मुझे बी.ए. करने (१९८७) के दौरान प्राप्त हुआ था, जब मैं अपने साहित्यकार ताऊ जी  'प.गंगारत्न पाण्डेय' जी के साथ चौक स्थित उनके निवास पर एक साहित्यिक गोष्ठी में गयी थी.… अपने तख़्त पर किसी बादशाह की तरह मसनद की टेक लगाए हुए , पान रचे बैठे थे। उन्होंने मुझे अपना उपन्यास ''बूँद और समुद्र'' पढ़ने को दिया था और हँसते हुए कहा था, '' वापस कर देना''....... लकिन मैं किताबों की शुरू से ही लालची रही हूँ इसलिए वह आज तक मेरे पास उनके आशीर्वाद के रूप में है।  लेकिन तब मैं नहीं जानती थी कि ये मात्र पढ़ने के लिए दिया गया कोई उपन्यास नहीं है, अपितु एक दिन मैं उसी पुस्तक को आधार और आदेश मानकर अपना शोध-कार्य करूंगी। दुबारा उनके जीवित रहते उनसे मुलाक़ात का अवसर नहीं प्राप्त हो पाया क्यूंकि ताउजी अमरीका चले गए थे।  हाँ, १९९० में मेडिकल कॉलेज में उनको देखने अवश्य गयी थी,  लेकिन कोई भी बात ना कर सकी थी क्यूंकि डॉ ने मना कर  दिया  था।  वह तब  भी साहित्यिक वीथिका में उलझे रहते थे, उनकी ज़िंदादिली देखकर कोई नहीं कह सकता था कि  उन्हें जानलेवा कैंसर है।
उनकी कृतियों  में जिस गंगा जमुनी संस्कृति की बात है वह आज के सामजिक परिदृश्य में अत्यंत आवश्यक है।  उनके बूँद और समुद्र, सुहाग के नूपुर, अमृत और विष, मानस का हंस, और  विशेषतः 'नाचौ बहुत गुपाल' जितनी बार पढ़िए , रोमांच हो आता है।  कहानियों पर तो टीवी सीरियल बन ही चुके हैं और उनका सर्वेक्षण कार्य 'ग़दर के फूल' और 'ये कोठेवालियां', ये सिद्ध कर देता है की लेखन मात्र शान्ति की अवस्था में एकाग्रचित्त होकर सोचते हुए करने का कार्य नहीं है..... …।
अपना शोध-प्रबंध मैंने '' नगर जी के कथा- साहित्य में अवध- संस्कृति'' पर ही लिखा और उस सिलसिले मैं जाने कितनी बार चौक स्थित उनके उस घर गयी जहाँ उनकी यादों को उनकी पौत्री ने यथावत रखा हुआ था। ये मेरा दुर्भाग्य ही है कि अपनी व्यस्तताओं के चलते  उसको मैं आज तक किताब के रूप में प्रकाशित ना करवा सकी लेकिन आज उनके ९९वी जयंती पर श्रद्धांजलि स्वरुप वचन लेती हूँ कि  जन्मशती पर  उनके उसी  निवास पर, उसी तख़्त पर, उन पर लिखी किताब रखकर आऊँगी।
गंगा जमुनी संस्कृति के चतुर चितेरे नागरजी को मेरा शत शत नमन।
                                                                                                           डॉ रागिनी मिश्र 
                                                                 

शनिवार, 16 अगस्त 2014

भारतीय गाँवों में आज़ादी के जश्न के मायने



जब तक लखनऊ के पॉश कहे जाने वाले गोमती नगर के विद्यालय में कार्यरत रही, किसी भी राष्ट्रीय पर्व पर वह जोश और उल्लास देखने को नहीं मिला, जो आज बाराबंकी के एक छोटे से कस्बे  में देखने को मिला। तबियत ख़राब होने के कारण दो दिन से विद्यालय नहीं गयी थी और हमारे विद्यालय की बिल्डिंग भी अभी पूरी नहीं बनी है, इसलिए जूनियर हाईस्कूल में ही स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम होना था।   लेकिन बच्चों ने फोन पर ही अपनी निर्माणाधीन बिल्डिंग पर ध्वजारोहण करने की प्रार्थना की, ''मैंम; जितनी भी बनी  है अपनी तो है न ? हम फाइनल इयर में हैं, अगले साल कहाँ १५ अगस्त मनाएंगे , क्या पता? " कैसे ना मानती ये बात ? फोन पर ही हम भावुक हो गए।  मेरे ही विद्यालय में मुझे बच्चों ने सादर आमन्त्रित किया।
 मैं भी इतनी उत्साहित थी कि एक घंटे की ड्राइव के बावजूद सुबह 7.20 पर ही विद्यालय पहुँच गयी, जो कि  लखनऊ में २ मिनट का रास्ता तय कर जाने में 7. 45 हो जाते थे। अद्भुत नज़ारा था. मेरे रास्ते में लगभग 5 बेसिक और 4  प्राइवेट स्कूल हैं, सबके सब अपने सीमित साधनों में भरपूर सजे थे, झंडियां, रंगोली, चूना, फूल।
लगभग हर जगह बच्चे और टीचर्स 7 .15  पर ही मौजूद थे,  रास्ते में जाने वाले हर बच्चे के हाँथ में तिरंगा था।  गरीब की साइकिल पर भी तिरंगा था और झोपडी पर भी छोटा सा कागज़ का तिरंगा था।  ये वास्तविक राष्ट्रीय भावना थी …… सच, अपना बचपन याद आ गया।  रात में ही बाबा तिरंगा ला देते थे और सुबह चकाचक यूनिफार्म और हाँथ में तिरंगा लेकर अपने को '' भगत सिंह" से काम नहीं समझती थी  ................ और जैसे ही कार अपने निर्माणाधीन स्कूल के पास रोकी, बच्चों का झुण्ड समवेत स्वर में बोला, ''गुड मॉर्निंग मैम " एक लड़के ने जोर से डाँटा  '' नहीं'' और फिर सब एलर्ट खड़े होकर बोले " जय हिन्द"…।
अजीब सा रोमांच हो आया।  बिल्डिंग को दो दिन में ही बच्चों ने बाहर  से पुतवा दिया था, झंडे के लिए रॉड लग गयी थी, गाँधी आश्रम से खादी  का तिरंगा आकर लग चुका था।
चूने से पूरे रास्ते पर लाइन और ऐरो बने हुए थे , लड़कियां धान की भूसी को विभिन्न रंगों में रंगकर रंगोली बना पूरी कर रही थीं, जिन बच्चों को हमेशा साफ़ यूनिफार्म में आने के लिए डाँटना पड़ता रहता था, आज सब सफ़ेद साफ़ कपड़ों में थे।
मन खुश हो गया।  आज़ादी की ख़ुशी दोगुनी हो गयी.… लखनऊ में हमेशा ही 20 दिन पहले से ही पढ़ाई लिखाई  किनारे कर हम देशगीत और भाषण की प्रैक्टिस करते रहते थे, लेकिन यकीन मानिए ; यहाँ हर बच्चा अपने आप तैयार था।
क्या लड़कियां और क्या लड़के....... सबके हाँथ में एक पर्चा सा था।  एक के बाद एक अपने आप खड़े  होकर कुछ ना कुछ देश भक्ति से भरे हुए भाव व्यक्त कर रहे थे।
 ये फॉर्मेलिटी नहीं थी; सच में देशप्रेम के उदगार थे। सोचा था एक घंटे में निपट जाएगा सारा कार्यक्रम लेकिन मैंने अपनी ख़ुशी से बच्चों के बीच लगभग 4 घंटे बिताये,

आसपास के घर वालों ने भी ध्वजारोहण में भाग लिया और उन्होंने ने भी अपनी पुरबिया में गाने सुनाये।
लड्डू दुबारा मंगाए और जी भरकर सबको खिलाये।  आज मैंने मन ही मन इस छोटी सी जगह पर पोस्टिंग के लिए सरकार को धन्यवाद दिया। 'जय हिन्द'

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

यारों दोस्ती बड़ी ही हसीन है .... भाग - २




अभी 13  नवम्बर 2013  में  28  साल बाद हम बचपन की सहेलियाँ  प्लान करके इलाहाबाद में इकट्ठे  हुए थे। …28  साल बाद,  बचपन की सखियों से मिलना क्या सुख होता है , इसको शब्दों में बता पाना असम्भव है।  हम एक दूसरे को देखकर आनंद से विभोर हो गए थे..... 1996  में इन्टर के बाद ये कभी नहीं सोचा था की सब अलग अलग हो जायेंगे और मिलने में इतना वक़्त लग जाएगा और पिछले साल मिलने के बाद ये सोचकर दुःखी थे कि अब कब मिलेंगे? लेकिन वाह रे दोस्ती की लगन .... जैसे ही श्रद्धा का फ़ोन आया की वो 6th अगस्त को बड़ौदा  से इलाहाबाद आ रही है , हम सबके फ़ोन की घंटी बजने लगी और दिल की भी..... चूँकि बच्चों के 1st टर्म खत्म हो गए थे इसलिए घर से अनुमति मिलने में ज्यादा देर  नहीं लगी..... और फटाफट सबने आने के लिए हाँ कर दी और प्लान भी बना तो " फ्रेंडशिप डे" के बाद..... भावनाएं कुछ ज्यादा ही उफान पर थी.....


धड़ाधड़ सबके रिजर्वेशन हो गए..... … और 6th अगस्त का दिन आ गया।  मीना के घर रुकने का प्लान बना। अलका जौनपुर से , रजनी बनारस से, श्रद्धा बड़ौदा से और मैं लखनऊ से पहुँच रहे थे और अंजू और मीना तो हमारा स्वागत करने के लिए इलाहाबाद में ही थीं।  बस, इतने लोग ही फेसबुक के माध्यम से मिल पायें थे, जिसके लिए हम हमेशा ही फेसबुक के आभारी रहेंगे।  चूँकि श्रद्धा के मायके में फंक्शन था इसलिए वो मीना के घर सुबह से नहीं थी,,,, मैं करीब 12  बजे पहुँची , तब तक अलका और अंजू पहुंचकर हम सबका इंतज़ार कर रही थी।  लिपटकर सब गले मिले और बस, ठहाकों का दौर चल पड़ा।  श्रद्धा 10  मिनट में हेस्टिंग्स रोड से आ गयी और फिर चालू हो गया 40+ लेडीज का स्वीट 16een  वाला दौर।  हमें लगा कि हम आज भी उतने ही जवान और एनर्जेटिक हैं।  ये बचपन की दोस्ती भी कमाल की होती है।  हर महंगे टॉनिक से ज्यादा असरदार। रजनी की ट्रेन थोड़ा लेट थी इसलिए हम सब लंच के लिए उसका इंतज़ार कर रहे थे।  लेकिन लगातार कुछ ना कुछ खाये ही जा रहे थे और वैसे भी ये सर्वमान्य सत्य है कि बचपन में जिस शहर की १० पैसे की लकड़ी के डिब्बे में रखी हुई बर्फवाली आइसक्रीम खायी हो बड़े होकर baskin robbins  भी उसके आगे फीकी ही रहती है।  और मेरी जबान तो 'लोकनाथ चौराहे की फ्रूट आइसक्रीम' पर वैसे ही फिसल जाती है।  अंदर गली में 'हरी नमकीन  के समोसे, मठरी' और थोड़ा आगे मंदिर के सामने वाली 'चाट की दूकान पर वो करेला और बैगनी'…। आज तक लगभग पूरा भारत घूम आई हूँ, ऐसी चाट कहीं नहीं मिली और फ्रूट आइसक्रीम तो मानो गूलर का फूल हो।  हम हंस रहे थे, बतिया रहे थे, खा रहे थे, लड़ रहे थे , …। रजनी बस पहुँचने वाली थी।  उसके लेने मीना के  देवर जा चुके थे।  अचानक  'रजनी आ गयी रजनी आ गयी ' के शोर से मानों पूरा सिविल लाइन्स गूँज गया.… रजनी पिछले साल किसी कारणवश नहीं आ सकी थी इसलिए उससे मिलने की बहुत उत्सुकता थी। रजनी बचपन से ही गंभीर और समझदार थी, आज उससे कुछ और ज्यादा। लेकिन थोड़ी ही देर में वह हमारे रंग में रंग गयी और फिर तो बस्स्स ,,, :):):)

3  बज गए थे।  इसलिए खाना खाने का इरादा बना सब मीना की रसोई में घुस गए.. … उफ्फ्फ , कितनी वैराइटी बना रखी थी उसने और शायद सब मेरी पसंद का।  मैं अक्सर जाती रहती हूँ और भी अक्सर लखनऊ आ जाती हैं।  अरहर की दाल, शिमला मिर्च पनीर की मस्त सब्जी, दम आलू , लौकी की सूखी सब्जी, सलाद , दही, चावल , रोटी और जाने कितने तरह की मिठाई लेकिन अपना दिल तो 'कामधेनु' के बूंदी वाले लड्डू पर अटक जाता है। हम हंस रहे थे , खा रहे थे , एक दूसरे  के मुंह में कौर खिला रहे थे, फोटो भी ज़रूरी थी इसलिए वो भी खिंचवा रहे थे।

6  बजे से श्रद्धा के यहाँ उसके भतीजे के जन्मदिन का उत्सव था।  भैया ने हम सबको पहले से invite कर रखा था। वह इसलिए ५ बजे अपने घर चली गयी लेकिन हम तो अपने में ही मगन थे इसलिए पहले बचपन की मिलन  स्थली सिविल लाइन्स के 'हनुमान मंदिर' जाने का निर्णय लिया गया.… चूँकि पिछली बार रजनी नहीं आ पायी थी इसलिए उसके साथ भी अपनी दोस्ती की नज़र उतारने हम पहुँच गए 'हनुमान मंदिर'. .... .... यहाँ पहुंचकर हमेशा ही अजीब सी शान्ति और आनंद की अनुभूति होती है।  आखिर बहुत सारी  यादें जुडी हैं यहाँ से। यहाँ आज भी उसी तरह से डलिया  में प्रसाद के लिए मिठाई और लकड़ी की तश्तरी जैसे में चढ़ावे के लिए फूल मिलते हैं और कमोबेश स्वाद भी वही।  पूरे मंदिर के दर्शन कर उसी तरह से नज़र उतार हम जैसे ही गाड़ी पर बैठे, श्रद्धा के फ़ोन आने लगे।  'जल्दी आओ जल्दी आओ' की रट।  उसका हमारे बिना वहां फंक्शन में भी मन नहीं लग रहा था और हम वो गलियां, वो सड़कें, वो स्कूल  .... की यादों से निकल नहीं पा रहे थे।

हमें श्रद्धा की मम्मी और पापा से भी मिलना था।  उनका स्नेह आज तक हम लोगों को उनसे बांधे हुए है। हम जल्दी- जल्दी तैयार होने में जुट गए।  अब 5 औरतें तैयार हो रही हों, तो वक़्त तो लगता ही है।  अलका और मीना आज भी उतनी ही तन्मयता से तैयार होती हैं जितनी उस समय होती थी।  उसको तैयार होता देख मन खुश हो जाता है। … पूरा 16 श्रृंगार।  अंजू और रजनी शुरू से ही गोरी चिट्टी और सुन्दर थीं , उनको मेकअप की ज़रुरत वैसे भी नहीं पड़ती और अपन तो हमेशा से ही जस के तस।  गोरा होने के लिए पाउडर सा सहारा लेना ही पड़ता है :):):) खैर, अब तक श्रद्धा के बीस फ़ोन कॉल्स आ चुके थे , चिल्ला रही थी , गुस्सा हो रही थी लेकिन हमारी खिलखिलाहट कम ही नहीं हो पा रही थी और यकीन भी था कि 2 मिनट में उसे मना  ही लेंगे।
6 बजे की पार्टी में हम 8  बजे पहुंचे।  श्रद्धा का मुंह फूला हुआ था लेकिन जैसे ही सबने एक साथ उसे गले से लगाया सब गुस्सा काफूर। श्रद्धा के भैया, भाभी से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई. … हम लपके उसकी मम्मी की तरफ।  उन्होंने हम सबको गले लगाकर प्यार किया।  वहां भी हम सब आपस में मगन थे।  खूब मस्ती की।  अंकल हमेशा की ही तरह आँटी के प्रेम में रँगे दिखे।  वह हम सबके लिए उपहार में साड़ियाँ और सूट लायें  थे।  हम भी उनसे पूरे हक़ से लेते हैं।  कोई संकोच नहीं।  मानों सबके अपने मम्मी पापा हों। पार्टी खत्म होने की कगार पर थी।  हमनें मीना के यहाँ रात में रतजगे का प्लान बनाया था इसलिए श्रद्धा भी घर से अनुमति ले हम सबके साथ आ गयी।

हम सब एक- दुसरे के लिए उपहार लेकर आएं थे।  रजनी बनारस की सुन्दर सुन्दर चूड़ियाँ और स्पेशल बिस्कुटलायी थी , अलका ने हम सबके लिए खूबसूरत से पर्स लिए थे, मीना ने हम सबको बहुत ही सुन्दर फ्रेंडशिप बैंड  पहनाया , मैं अपनी परमप्रिय 'सुगन्धको' के इत्र लेकर गयी थी और प्यारी अंजू हम सबके पिछले बार के एक प्यारे से फोटो को कॉफी मग पर बनवाकर लायी थी..... वो हमारे लिए सबसे स्पेशल था।  रजनी उदास थी , क्यूंकि उसमें उसकी फोटो नहीं थी।

अब रात का हाल तो क्या लिखूं ? ठहाके ठहाके और ठहाके।  श्रद्धा तो मानों कपिल पशु आहार खाकर आई हो बड़ौदा से।  उसकी एनर्जी तो समय के साथ बढ़ती ही जा रही थी।  कितनी बातें , कितनी यादें हमनें शेयर की। इतना खाने के बावजूद बीच बीच में कोई जाकर चाय बना लाता तो कभी कोई नींबू पानी।   सुबह के 4 बजे जाकर सबको डांटकर मैंने ही सुलाया क्यूंकि सुबह भी कई प्रोग्राम थे लेकिन 5.30 पर ही सब फिर जग गए।  और फिर उसी एनर्जी के साथ।  मैं सोचकर हैरान थी कि दोस्तों में कौन सा revital होता है? अभी घर पर कमर दर्द और पैर दर्द कर रही होती।


रजनी को जल्दी जाना था इसलिए वो नहाधोकर तैयार थी.…  अंजू चाय बना लायी थी , बहुत ही टेस्टी। लेकिन सबने रजनी को देर तक रोकने का सोच रखा था।  हम पिछली बार भी अपनीप्रिय इंग्लिश टीचर से मिलने गए थे, लेकिन उनकी बेटी मिली थी वह नहीं मिल पायीं थीं।  अबकी सब पहले से तय था।  9 बजे उनसे मिलना तय हुआ था।  रजनी भी उनसे मिलना चाहती थी इसलिए उसने अपनी ट्रेन मिस कर दी।  अंजू का बीटा दिल्ली से आ गया था इसलिए उसे घर जाना पड़ गया।  वह बेमन गयी और हमने भी उसे भारी मन से विदा दी।  तय समय पर हमने मैम के घर की बेल बजा दी।  वह भी इंतज़ार कर रही थीं. … उतनी ही यंग और फिट दिख रही थीं वह।  उनसे मिलकर हम आह्लादित हो गए।  जाने कितनी देर वह हमसे बातें करती रहीं।  अपने प्रिय बच्चों को देखकर वह भी खुश थीं।  चूँकि वह प्रिंसिपल बनकर रिटायर हुई थीं इसलिए उन्हें मुझ पर बहुत गर्व हो रहा था।  बचपन में वह हम लोगों को अच्छे मार्क्स आने पर हमेशा टॉफी देती थीं , आज  भी उन्होंने हमारे लिए टोफी और चॉकलेट रखी  थी।  उनके पैर छू, उनसे विदा ले हम वापस आये।  अब तक 12 बज चुके थे.। श्रद्धा का भाई उसे लेने आ गया था, वह गले लगकर गयी।  रजनी को देर हो रही थी , उसे बस में बैठाया।  अब बचे मैं, अलका और मीना।  थोड़ी देर घूमे , लेमन सोडा पिया फिर एल्चिको में खाया और फिर अलका भी 3 बजे  अपने पापा से मिलने चली गयी।  मेरी 4 बजे की बस थी। सबको विदा कर, अगली बारजल्दी ही मिलने का वादा कर सबको विदा कर सबसे विदा ले भारी मन से मैं भी अपनी दुनिया की ओर चल पड़ी।

डॉ रागिनी मिश्र 

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

स्वतन्त्र भारत में भ्रष्टाचार का उदय ---भाग-1

स्वतन्त्र  भारत का पहला वित्तीय घोटाला…… वर्ष 1948
'' इंग्लैंड  से भारतीय सेना के लिए 155 जीपें खरीदी गयीं , जिसमें 80  लाख रुपये का घोटाला किया गया. इस घोटाले के  मुख्य सूत्रधार ''श्री वी. के. कृष्णामेनन'' थे। वर्ष1955  में ''श्री जवाहरलाल नेहरू जी'' ने इस घोटाले के पारितोषक के रूप में उन्हें अपने मंत्रिमण्डल  में शामिल कर लिया और घोटाले की  चल रही जांच को हमेशा के लिए बंद कर दिया। ……। काश! उसी वक्त भ्रष्टाचार के उस प्रथम अंकुर को कुचल दिया गया होता और कांग्रेस ने उसे और ना सींचा होता, तो आज एक भ्रष्टाचार (कोयला घोटाला) की कीमत 3 लाख 25 हज़ार करोड़ रूपये ना पहुँचती। आखिर यही तो है हर हाथ (कांग्रेस) शक्ति, हर हाथ (कांग्रेस) तरक्क़ी। ……
(साभार --गूगल एवं अन्य प्रकाशित लेख एवं पुस्तकें )

  

रविवार, 17 नवंबर 2013

''यारों दोस्ती बड़ी ही हसीन है''

                                ''अबके बिछड़े हुए शायद कभी ख्वाबों में मिलें
                                   कि जैसे सूखे हुए फूल,,,, किताबों में मिलें'',……
अभी अलविदा मत कहो दोस्तों, ना जाने  कहाँ फिर मुलाक़ात हो'' ………माह फरवरी … १९८६, तारीख याद नहीं, जब ये गाना मैं अपने स्कूल की farewell party में गा रही थी तो मुझे खुद नहीं पता था कि जिनके साथ १२ सालों से पढ़ रही हूँ , उनसे दुबारा मिलने में २७ साल का लम्बा समय खिंच जायेगा। उस समय  facebook और mobile तो छोड़िये landline भी कुछ घरों में हुआ करती थी.. इण्टर करने के बाद मैं लखनऊ आ गयी और सबसे नाता पोस्टकार्ड तक सिमट के रह गया. हम सब एक-दूसरे को कुछ समय तक नियम से ख़त लिखते रहें लेकिन मैं ठहरी किताबी-कीड़ा और B.A. कर रही थी मम्मी के कॉलेज से तो, फिर तो पूछो ही मत. सब काम बंद और पढाई, खेल-कूद,एन.सी.सी,प्रतियोगिताएं .… बस और हाँ थोड़े से नए दोस्त। धीरे- धीरे ३-४ साल के अंतराल पर कभी किसी का तो कभी किसी का शादी का कार्ड आ जाता पर हम स्त्रियां ( तब लड़कियां) कितनी बे-बस होती हैं कि बस .......... किसी की भी शादी में नहीं जा पायी। मीना, श्रद्धा, अंजू, रजनी सबकी ग्रेजुएशन करते ही शादी हो गयी और सब अपने-अपने घर-संसार में मस्त और व्यस्त हो गयीं और मैं अपने आगे की पढाई में.…। सिर्फ अल्का  थी जिसने  सबकी शादी में मस्ती की और वही १९९५ में मेरी शादी में आयी। बस उससे वह आखिरी मुलाकात थी क्यूंकि १९९६ में उसकी शादी के समय मैं माँ बननेवाली थी और मेरी स्थिति जानेवाली नहीं थी.…………। सब इधर-उधर, किसी को किसी की  नहीं थी खबर। ……
                                      ।
                                       फिर दिसम्बर २००५ में अचानक मीना का सन्देश आया कि वह मुझसे मिलने लखनऊ आ रही है. जाने  कितनी तैयारियाँ की मैंने। घर सजाया, तमाम खाने की चीजे लेकिन एक डर भी था मन में कि वह पहचानेगी कैसे? इतनी मोटी जो हो गयी हूँ मैं. लकिन उसके आने पर मेरे पैरों तलें जमीन सरक गयी. मेरे सामने दो लेडीज, दोनों मुझसे ज्यादा बलवान, मीना कौन?
                                     ''पहचानने से उसको आँखें कर रही थीं इंकार
                                       मन आप ही १० - २० कर रहा था बारम्बार
                                       कारण, आपस में नहीं था कोई भी मन-मुटाव
                                       ये तो था, बस्स, शरीर पर ढेरों चर्बी का पटाव''
स्थिति उसने ही सम्भाली और 'रगिनीइइइइइइइइइइइइइ ' कहते हुए अपने गद्दर बाहुपाश में मुझे लपेट लिया। दो दिन हमने साथ बिताये, बचपन लौट आया.…।   उसके दो बेटों और पति के साथ हम सब खूब लखनऊ घूमे।
 
                                          फिर अचानक इंटरनेट की  बयार चली ,फेसबुक की  लहर आयी लेकिन कोई ना मिला। ज़रुरत भी नहीं लगती थी. एक दिन मेरे पास एक लड़के रतन सक्सेना की request आयी, जाने कब तक पेंडिंग पड़ी रही..... accept करते ही मन बल्लियों उछल पड़ा।  अरीईईईईई ये तो श्रद्धा का बेटा है..... बस फिर क्या? लेकिन फिर वही स्त्रियों कि जिम्मेदारियाँ, आज अम्मा कि तबियत ख़राब, आज बेटे का इम्तहान और कभी मौसी के बेटे की शादी। मामला टाँय टाँय फ़िस्स।






                                         यहीं फेसबुक पर पिछले साल जनवरी में रजनी मिल गयी. वह बनारस में थी और हमें मार्च में बनारस जाना भी पड़ गया. वह हमें लेने आयी. उसकी तीन बेटियों के स्नेह में मैं अपने बेटी ना होने की कसक को भूल गयी. हम मात्र ५ घंटे साथ रहे लेकिन वह स्मृतियाँ आज भी अत्यंत मधुर हैं.




                                               हम सब फेसबुक से दूर ही रहते थे लेकिन जैसे बचपन में रटा था ''विज्ञान वरदान है या अभिशाप''…उसी तर्ज पर हम कभी-कभी एक दूसरे से chatting कर लिया करते थे और कभी-कभी फ़ोन पर बात। .... . लेकिन पिछले महीने श्रद्धा का का फ़ोन आया कि वह varoda से  allahabad  आ रही है और सबको आना है. अलका को जौनपुर से, रजनी को बनारस से और तुम्हे भी। यह फिर हम स्त्रियों के लिए मुश्किल की  बात थी..... देखा जाए तो मात्र ५ घंटों का सफ़र लेकिन सबको मैनेज करने में ही पूरा एक महीना गुजर गया और तय दिन के मुताबिक हम १३ नवम्बर को allahabad  के लिए चल दिए..... रजनी का फ़ोन आया कि उसके पैर में मोच आ गयी है वह नहीं आ पायेगी। बस में बैठने के पहले से ही पेट में तितलियाँ उड़ने लगीं, इतनी नर्वसनेस कि पूछो मत. जैसे कोई इंटरव्यू देने जा रही थी. जिस वोल्वो का टिकट बुक  था, वो कैंसिल हो गयी.… मुझे लगा हमारा मिलना अब ना हो पायेगा लेकिन पतिदेव ने हिम्मत बंधाते  हुए कहा, ''जाओ, सिर्फ ५ घंटे का सफ़र है, किसी भी बस से मुश्किल ना होगी''…। फिर क्या, चल पड़ी एक बस से, लेकिन भगवान् भी खूब चक्कर चला रहे थे, कुंडा के पास जाकर बस ख़राब हो गयी. उधर सबके फ़ोन पर फ़ोन.  सब मीना के घर पहुँच चुके थे और मेरा इंतज़ार कर रहे थे. मैंने बताया मुझे आने में देर हो जायेगी लेकिन किसी ने भी मेरे पहुंचे बिना चाय तक पीने से इंकार कर दिया था. मेरी बस ३.३० बजे सिविल लाइन्स बस स्टैंड पहुंची। बस ने हनुमान-मंदिर चौराहे पर ही उतार दिया, फ़ोन पर हम लगातार संपर्क में थे, उतरकर जैसे ही इधर-उधर देखा कि एक 'इनोवा' से 'रागिनी'-'रागिनी' की चिल्लाहट सुनी, गाड़ी पास ही आकर रुकी और श्रद्धा, मीना, अंजू, अलका सबने एक साथ मुझे बाहों में भर लिया , दो मिनट हम बिना किसी भी गाडी का हॉर्न सुने सड़क पर ही शांति से लिपटे खड़े रहे, आँखें सबकी नाम थी और गला रुंधा हुआ. पता चला कि श्रद्धा के मम्मी-पापा ने लंच का अरेंजमेंट किया है, हम सब उल्लसित मन से पहुंचे hastings  road ,उसके घर. पहुँचते ही आंटी अंकल और श्रद्धा के पति तथा दोनों बेटों  ने पूरे जोश और स्नेह के साथ हमारा स्वागत किया। किसी ने भी ४ बजे तक खाना नहीं खाया था मुझे ख़ुशी भी हुई और बुरा भी लगा कि मेरे कारण आंटी अंकल चार बजे तक भूखे रहे. घर की सजावट का तो कहना ही क्या। .... लगा जैसे सपनों के महल में हो और सबसे खास बात कि खाना अंकल और आंटी  ने खुद बनाया था, इतने नौकर चाकर के होते हुए भी उन्होंने अपने बेटियों के लिए  सब खुद किया था..... मन गदगद था और खाना अत्यंत स्वादिष्ट। उसके बाद हमने सिर्फ और सिर्फ मन भरकर मस्ती की. सब कुछ भूल गए हम कुछ समय के लिए।  कभी कोई किसी को प्यार कर रहा था तो कोई ताना मार रहा था, पुरानी  बातें, गाने, स्कूल के डांस, टीचर्स और न जाने क्या-क्या।।।।।।। सबसे बढ़िया बात, किसी ने भी अपनी वर्त्तमान ज़िंदगी, प्रोब्लेम्स, सास-ससुर का रोना कोई चर्चा तक नहीं। बस हम थे और हम थे। …… हमने अपनी मुलाक़ात कि पहली वर्षगाँठ मनायी केक काटकर, खूब मस्ती की। .... चाय आ गयी, पी ली, स्नैक्स आ गए खा लिए लेकिन मस्ती में कोई disturbance नहीं था , जिसके लिए हमने अंकल और आंटी को और भगवान् का जीभरकर आभार व्यक्त किया। । फिर हम निकले लोकनाथ कि तरफ, वहाँ कि मशहूर 'फ्रूट आइसक्रीम' खाने। जाने कितने ज़माने की  भूख थी कि शांत ही नहीं हो रही थी. फिर हम सिविल लाइन्स गए 'हनुमान मंदिर' वहाँ अपने मिलने के लिए उनका धन्यवाद किया और अपनी दोस्ती कि नज़र उतारी। सुबह ५ बजे श्रद्धा कि ट्रैन थीं  इसलिए उसे १२ बजे उसके घर छोड़ दिया। कोई गले नहीं लगा क्यूंकि हम सब दर रहे थे कि अब रोये तो बहुत बुरा लगेगा लेकिन आँखें  सबने पोंछी। फिर मैं मीना के घर अलका अपने मायके और अंजू अपने घर चली गयी , सुबह संगम के लिए निकलना था।








                                                                                                            क्रमशः
                       

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मानव, मन, माया

होती हैं इच्छायें असीमित, मानव के इस मन की ,
पूरी करने में वह उनको, खोता सुध-बुध तन की। ……


चलता ज्यों कोल्हू का चक्कर,फिरता वैसे ही वह भी ,
मूँद आँख गिरता शिशु कोई ,  गिरता वैसे ही वह भी । …. 


जलकर गिरता रहे पतंगा , ज्यूँ दीपक के पीछे
मानव का यह मन भी भागे, आकर्षण के पीछे। ……


नाते-रिश्ते सब कुछ खोता, रोता ही रहता वह,
सब धोखेबाज भरे हैं जग में, गाता ही रहता वह। ….


स्वयं सशंकित रहता और, सबको भी भ्रम में रखता,
धन-संतोष भूल वह बस, माया- माया ही रटता। …….


जलता ही रहता हरदम वह, ईर्ष्या - द्वेष की ज्वाला में,
होता जाता आकंठ निमग्न, ठगिनी माया की हाला में.। …….  .….


पूरी  करने में हर इच्छा, अक्सर भूल वह जाता ,
लख चौरासी योनियों में, मानव-जीवन है पाता। …


 बैर भाव को भूल जब सबको,  स्वयं सदृश तुम पाओगे,
मन भरेगा धन-संतोष से तब, भव-सागर से तर जाओगे। …।


…………………। डॉ रागिनी मिश्र। ………………





रविवार, 18 अगस्त 2013

पिया! हमही तुमरा पियार हूँ, सजन! हमही तुमरी यार हूँ,


पिया! हमही तुमरा पियार हूँ 
हमहूँ का चितवो एक बार। … 
सजन! हमही तुमरी यार हूँ,
हमते बतियाओ तौ एक बार। …।

               (१ )



रोजै ही मन करत हमार 

फेंक देई मोबाइल तोहार 
चिपक के हरदम जेहिते तुम  
बातन का लगउते अम्बार,
मुला; हमते कुच्छो कहिते
मुँह जेइसे सिय जात तोहार,
ब्याह किये का उकै संग ?
की है तू भरतार हमार ?


                (२ )

फोड़ देई ई कम्पूटर का
घंटन करते ऊसे आँखें चार
फेसबुक और आरकुट  का
मरिबेइ जूता चार हज़ार
हरदम्मै ही चैट बाक्स पर
लागे सुंदरियन की कतार
करि देइब डाइल १०९० हम
अब तो सुधर जाओ सरकार। ….


पिया! हमही तुमरा पियार हूँ
हमका भी चितवो एक बार ,
सजन! हमही तुमरी यार हूँ,
हमते बतियाओ तौ एक बार। …।


                                             डॉ रागिनी मिश्र 


शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

'' यात्रा अमरनाथ धाम की''

                                                      भगवान शिव के पवित्र धामों में 'श्री अमरनाथ धाम' का नाम सर्वप्रमुख  है। यहाँ पर पवित्र व्यास गुफा में प्रतिवर्ष प्राकृतिक रूप से बननेवाला 'हिमलिंग' भक्तों को अत्यंत कठिन रास्तों के बावजूद अपनी और खींच लाता है.  दुर्गम रास्ते, मनोहारी प्राकृतिक दृश्य और आंख मिचौनी खेलते मौसम के बीच शरीर को अत्यंत थकित कर देनेवाले सफ़र को पूरा करके भक्तगण जब 'बाबा बर्फानी' की गुफा पहुँचते हैं तो उनकी  आँखों से स्वतः ही ख़ुशी के आँसूं फूट पड़ते हैं, शरीर रोमान्चित हो उठता है और मन एकदम शांत। अमरनाथ की उस पवित्र गुफा में बाबा बर्फानी, माता पार्वती और प्रथम पूज्य गणेश जी के प्राकृतिक रूप से निर्मित हिमलिंग के दर्शन कर भक्तों का जीवन सफल हो जाता है . 

                                                                 प्रतिवर्ष जून माह में प्रारम्भ होनेवाली इस पवित्र यात्रा के लिए दर्शन हेतु जाने वाले व्यक्ति का चिकित्सीय परीक्षण अब अनिवार्य कर दिया गया है. 'श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड' ने हर शहर में ३-४ सरकारी अस्पतालों की सूची चिकित्सकों के नाम के साथ अपनी  वेबसाइट पर डाल रखी है. वहाँ यात्रियों की  हड्डी, ह्रदय, रक्तचाप, एलर्जी, नेत्र -परीक्षण तथा मधुमेह इत्यादि की निःशुल्क जाँच की जाती है जिसमे मानक पर खरे उतरने के बाद चिकित्सक द्वारा जारी किये गए प्रमाण-पत्र को दिखने के बाद ही यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन होता है. रजिस्ट्रेशन के लिए भी 'श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड' वेबसाइट पर कुछ राष्ट्रीयकृत बैंक की सूची है. वहां पर प्रतिव्यक्ति मात्र ३० रूपये का शुल्क जमा करके दर्शन की तिथि और रजिस्ट्रेशन कार्ड मिलता है. यहाँ पर यात्री को अत्यंत सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि जो तारीख मिलती है वह सिर्फ उसके दो दिन बाद तक ही मानी रहती है ना उसके पूर्व ना ही पश्चात। अतः यात्री अपनी ट्रेन, बस या हवाई जहाज की बुकिंग की अनुसार ही दर्शन की तिथि प्राप्त करें, ताकि संभावित परेशानियों से बचा जा सके.

                                       हम ट्रेन का सफ़र करके 'जम्मू' पहुंचे। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर जम्मू को 'कश्मीर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. जम्मू के बाद ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच सर्पीले रास्तों का सफ़र सभी को टैक्सी अथवा बस द्वारा ही करना पड़ता है. हमने  भी ऑनलाइन ही 'ट्रैवलर' बुक करवा रखी थी जिस पर सवार हम सभी चल पड़े कश्मीर की खूबसूरत वादियों का नज़ारा करने। सबकी निगाहें बस खिड़की के बाहर ही टंग गयी थीं और कानों में मानों 'अमीर खुसरो' की कही गयी पंक्तियाँ कानों में गूँज रहीं थी, '' धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं हैं, यहीं हैं, यहीं है''.  मार्ग में सबसे पहले आया ''ऊधमपुर''……यहाँ पर हनुमान जी का 'संकटमोचन मंदिर' भक्तों की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है तथा 'सुन्दरानी मंदिर' में शिवलिंग के दर्शन के लिए रोज ही बहुत दूर-दूर से लोग आते हैं । थोडा और आगे सफ़र तय करने के बाद आया ''कुद''………. यहाँ पर भक्तों के रहते और खाने की अनेक धर्मार्थ संस्थाओं द्वारा बढ़िया व्यवस्था है. यहाँ लंगर खाने के बाद फिर से  हम चलती गाडी से वादियों की खूबसूरती का आनंद लेने लगे. लग रहा था ये सफ़र कभी ख़तम ही ना हो कि हम  पहुँच गए  ''पटनीटॉप'' ………. यहाँ की सुन्दरता से सभी परचित होंगे। यहाँ नवविवाहित जोड़े अपने हनीमून के लिए भी अब बहुतायत में आना पसंद करते हैं. यहाँ भी यात्रियों के लिए लंगर की व्यवस्था है.  हम यहाँ थोड़ी देर रुकने के बाद फिर चल पड़े क्योंकि सफ़र अभी बहुत ही लम्बा था. मार्ग में आगे पड़ा ''बटोट''…… यहाँ की मनोहारी छटा सबको रुकने के लिए बाध्य कर देती है. थकावट के बावजूद हम यहाँ भी गाडी से उतरे और धरती के स्वर्ग पर खुद को महसूस किया। इसके बाद आया ''रामबन''………. यहाँ की सुन्दर वादियों पर नेत्र टिक जाते हैं. यहाँ झरनों का जल अत्यंत स्वच्छ एवं पीने में मीठा भी है. यहाँ स्नान करने से आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है. बगल में बहती 'चिनाव' नदी का कल-कल जल मन  को असीम शान्ति प्रदान करता है.इस समय तक रात के ८ बज चुके थे और ड्राईवर हमें चुप-चाप गाडी में बैठे रहने के लिए कह रहा था क्योंकि ये पूरा रास्ता छावनी बना लगा रहा था . इसके बाद आई ''जवाहर टनल''……. लगभग २ किमी लम्बी इस टनल में बच्चे एकदम दम साधे बैठे रहे. अत्यंत रोमांचकारी लग रहा था. इसके आगे रात में जाना  सुरछित नहीं था और ना ही आगे जाने की अनुमति ही मिलती अतः हमनें अन्य यात्रियों की ही भांति FCI के गॊदाम में रात बिताई। यहाँ भी यात्रियों के लिए रजाई और कम्बल तथा स्थान उपलब्ध था . सुबह फ्रेश होकर हमनें वहां के लंगर में सब्जी और परांठा खाया। सच…. जो स्वाद उस यात्रा के दौरान लंगरों में खाना खाकर आया वो आज भी याद आता है. और हम सेना के जवानों को धन्यवाद कहकर चल पड़े अपने अगले पड़ाव की ओर.

                                  लगभग एक घंटा सफ़र करके हम पहुंचे ''अनन्तनाग''……… बचपन में यह नाम मैंने सिर्फ आतंकवाद के लिए ही सुना था. लेकिन हम पहुँचे यहाँ के सबसे खूबसूरत मंदिर '' मार्तण्ड मंदिर'' यानि भगवान् सूर्यदेव का मंदिर। यह अपने आप में अदभुत था. यहाँ दो कुण्ड थे ….''सुर्य कुण्ड' और 'विमल कुण्ड'' इनका पानी अत्यंत स्वच्छ था । उसमे मछलियाँ ही मछलियाँ थी. और वह भी अपने आप में अनोखी। वह हमारे हाँथ में आकर आटा ले जाकर खा रही थीं. हम सब वैसे भी पशु-प्रेमी ठहरे। तो हमारे लिए यह जगह अत्यंत प्यारी हो गयी. हम  काफी देर तक मछलियों के साथ मस्ती करते रहे. लोग कुंड में स्नान  भी रहे थे. अन्दर मंदिर में भगवान् सूर्य की अत्यंत तेजोमयी प्रतिमा थी. सूर्य मार्तण्ड ऋषि कश्यप एवं अदिति के तेरहवें पुत्र माने जाते हैं. यह मंदिर २६००  ई० पू ०  में  इसे पान्दव्वंशीव 'रामदेव' जी ने बनवाया था.  उसके बाद ७४२  ई०  में राज लालितदित्य ये मार्तंड इलाके में मंदिर बनवाये। उसके बाद ९वी सदी में राजा अवन्तीवार्मन' और १० वी  सदी  में राजा  'कलशक' ने मंदिर का विकास करवाया। मंदिर का ज़िक्र '' कल्हड़'' की ''राजतरंगिनी'' में भी आता है . चूँकि यह मंदिर 'पहलगाम'' के रास्ते में है इसलिए इसका महत्त्व अमरनाथ यात्रा से भी जुदा हुआ है. कहते हैं यहाँ मछलियों को दाना  खिलाये बिना  यात्रा अधूरी है.  . ….  दर्शन कर, प्रसाद ग्रहण कर हम प्रभु श्री राम और हनुमानजी के मंदिर भी गए. यह भी अत्यंत भव्य थे. इनका जीर्णोद्धार किया गया था क्योंकि अशांति के समय इन मंदिरों को अत्यंत छति पहुंचाई गयी थी. यहाँ बाहर हर तरफ सेना के जवान दिखाई पड़ रहे थे. वैसे तो पूरा कश्मीर ही सेना के हवाले है लेकिन मंदिरों के बाहर विशेष सुरछा की व्यवस्था है. मन थोडा दुःख से भी भर गया कि हम अपने देश में इतने ज्यादा असुरछित? खैर ………यहाँ से एक रास्ता 'खन्नाबल' से श्रीनगर होते हुए 'बालटाल' को जाता है और दूसरा 'पहलगाम' को . हमें जाना था 'पहलगाम'.  
. 

                               थोड़ी देर बाद आया हमारी यात्रा का पहला पड़ाव ''पहलगाम''…………।    बाबा बर्फानी की पवित्र गुफा तक पहुँचने के दो मार्ग हैं, पहला 'पहलगाम' होकर और दूसरा  'बालटाल' से. पहलगाम 'बैलग्राम' का अपभ्रंश है. कहते हैं कि शिवजी ने माता पार्वती को 'अमरकथा' सुनाने के लिए व्यास गुफा की ओर जाते समय इसी स्थान पर अपने प्रिय बैल 'नंदी जी' को छोड़ा  था. अधिकाँश यात्री गुफा तक पहुँचने के लिए इसी मार्ग का चयन करते हैं क्योंकि ये रास्ता अत्यंत ही मनोरम है. यहाँ की खूबसूरती विश्व-प्रसिद्द है. 'लेडर  नाला' का तीव्र वेग से बहता कल-कल करता जल बरबस ही सैलानियों को अपनी गोद में बैठकर आराम करने के लिए मजबूर कर देता है. यहाँ हमारे लिए पहले से ही  'angel's inn'  में कमरे बुक थे. वहां पहुंचकर हमनें होटलवाले से  'कहवा'  बनवाकर पिया, वह बहुत ही स्वादिष्ट और एनर्जी देनेवाला था. ऊपर कमरे, लकड़ी की गुमावदार सीढियाँ उतारकर खूबसूरत lawan, उफ्फ्फ …… मन किया बस , अब और कुछ नहीं , यही जन्नत है .  हमने पूरा डेढ़ दिन पहलगाम में बिताया और ये पूरा समय वहां की खूबसूरती को आँखों में भरकर सार्थक किया। यहाँ भक्तों के लिए भण्डारा ही भण्डारा था . खाने का वैसा स्वाद मुझे लखनऊ के अच्छे से अच्छे रेस्टोरेंट में कभी नहीं मिला। दाल,सब्जी,रोटी,कढी,राजमा ,चावल के साथ-साथ राजस्थानी खाना , पंजाबी खाना तथा तरह-तरह की मिठाइयाँ, मुरब्बे, दूध, सिवई, खीर, कुल्फ़ी इत्यादि  का आनंद पूरी भक्ति-भावना के साथ सब ले रहे थे. बीच-बीच में मस्ती में नाचते शिव-भक्तों के साथ हम सभी के पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगे. सभी भण्डारे वाले सभी को अत्यंत प्रेम और आदर के साथ खाने के लिए बुला रहे थे. यहाँ पर एक छोटी सी मार्केट भी लगी थी जिसमे उचित दामों पर रेनकोट, मोज़े , दस्ताने, टोपी, और अन्य यात्रा की जरूरत का सामन उपलब्ध था. यहाँ का 'मम्मल मंदिर' पुराने स्थापत्य कला का नमूना है. ये तो सभी जानते हैं  कि यहाँ पर बहुतायत में मंदिरों को छति पहुंचाई गयी है इसलिए इस बचे हुए मंदिर में सभी भक्तजन शिवलिंग के दर्शन करने अवश्य आते हैं. यहाँ से अमरनाथ की पवित्र गुफा ४६ किमी दूर है . यह स्थान  समुद्रतल से ८५०० फीट ऊँचाई पर स्थित है .

                                          यहाँ से अमरनाथ जी की गुफा तक के लिए वास्तव अर्थों में यात्रा आरम्भ होती है.
जिसका अगला पड़ाव था  ''चंदनवाड़ी''……………. पहलगाम से चंदनवाड़ी तक टैक्सी से जाया जा सकता है क्योंकि ये रास्ता ठीक है.  यहाँ प्रातः जितनी जल्दी पहुंचा जा सके उतना ही अच्छा होता है अन्यथा पीछे गाड़ियों के लम्बी कतार लग जाती है क्योंकि चंदनवाड़ी पहुँचने का रास्ता प्रातः ६ बजे ही खुलता है यहाँ पर यात्रियों को अपने रजिस्ट्रेशन कार्ड की जाँच करवानी पड़ती है. थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ये जाँच तीन चरणों में संपन्न होती है. यहाँ से यात्रियों की सुविधा के लिए घोड़े, खच्चर, पालकी इत्यादि मिलने लगते हैं. दो  से लेकर ढाई हज़ार में गुफा तक का घोडा मिल जाता है. यात्रियों को चाहिए कि घोड़े के लिए थोडा गुड चना अपने साथ ले जाएँ , इससे बड़ा पुण्य का कार्य और कोई नहीं। हम सभी लखनऊ से ही ये सब सामान लेकर गए थे और जैसे ही अपने-अपने घोड़े पर सवार हुए उसे खिला  दिया।  घोड़े से यात्रा करने से पूर्व घोड़ेवाले का कार्ड अपने पास ले लें ताकि आगे किसी भी असुविधा से बचा जा सके . इस स्थान से गुफा की दूरी ३२ किमी है. यहाँ तो भण्डारेवाले सभी यात्रियों को बुला-बुलाकर, मनुहार करके कुछ न कुछ खाने का आग्रह कर रहे थे . हम सुबह ३ बजे के उठे हुए थे और यहाँ पहुंचे-पहुंचे ८. ३०  बज गए थे और भूख लग रही थी अतः हम आलू का परांठा खा कर फिर आगे बढे. कोई धर्मार्थी हमें टाफी पकड़ा रहा था तो कोई मेवे, माजा और फ्रूटी भी.हमारा भाग्य बहुत अच्छा था क्योंकि मौसम बिलकुल साफ़ था न कोई बादल न बरफ के आसार।

                                     ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर घोड़े को कसकर पकड़कर बैठने से सही रहता है. मार्ग पतला है और उसी पर घोड़े, पैदल और पालकी वाले सभी चलते हैं इसलिए सावधान रहना बहुत ज़रूरी है. रास्ते में भक्तगण शिव बाबा का जयकारा लगाते हुए मार्ग को आसान करते रहते हैं. अब; मैं तो सच बताऊ; डरने लगी थी रास्तों की बीहड़ता देखकर . मन ही मन 'रुद्राष्टक' का पाठ कर रही थी और सबको सही-सलामत रखने की प्रभु से याचना कर रही थी . थोड़ी देर में समझ आ गया कि घोड़े पर कैसे बैठना है. अबकी हमारा अक्टूबर में की गयी 'केदारनाथ' यात्रा का पूर्व अनुभव भी काम आया . चढ़ाई पर आगे झुक जाओ और उतराई पर शरीर का भार भिल्कुल पीछे।
                               
             थोड़ी देर में हम पहुँच गए ''नीलगंगा'' …… इसके काले जल को लेकर एक कथा प्रचलित है. एक बार माता पार्वती  के नेत्रों का काजल भगवान् शिव के अधरों पर लग गया तब शिवजी ने उसे यहाँ धोया तभी इसका जल काला पड़ गया .

                                इसके बाद एकदम कड़ी चढ़ाई वाली आई ''पिस्सूघाटी''……… अब मार्ग काफी कठिन लगने लगा था. मैंने और भाभीजी ने घोड़ेवाले के साथ-साथ अपने लिए एक हेल्पर भी कर लिया था जो हमें ऊंची चढ़ाइयों पर पकडे हुए था. बच्चे हम दोनों का डर देखकर हँस रहे थे और हम उनकी हँसी से अपने अन्दर हिम्मत बाँध रहे थे . इसके नाम को लेकर भी एक कथा प्रचलित है,…… एक बार देव-दानव महादेव के दर्शन करने जा रहे थे तब दोनों में प्रथम दर्शन की होड़ लग गयी. युद्ध हुआ, दानवों ने देवोँ को बुरी तरह पराजित कर दिया। देवताओं ने शिव की प्रार्थना की. उनके आशीष से देवोँ ने पुनः युद्ध किया और दानवों की हड्डियों तक को पीस डाला और यहाँ बिखेर दिया, तभी से इस घाटी का नाम 'पिस्सू घाटी' पड़ा. कहते हैं इस पर्वत मात्र के दर्शन से कुरुछेत्र,प्रयाग तथा गंगासागर के दर्शनों जैसा फल प्राप्त होता है . यह स्थान समुद्रतल से ११५०० फीट ऊँचाई पर है.
                      
                          इसके बाद का रास्ता थोडा कठिन था.  यहाँ हमें घोड़ेवाले ने पैदल चलने के लिए कहा. हम लगभग २ किमी पैदल चले. साँस फूलने लगी थी. जो लोग नहीं चल पाते, उनके लिए इस स्थान पर पालकी की सुविधा है; बस दाम कायदे से लेते हैं. इस बार बरफ कम थी तो पत्थरों पर चलना थोडा ज्यादा कठिन था क्योंकि जो बरफ थी वह पिघलकर पानी कर रही थी और उस पर मिटटी …. सब तरफ किचकिच हो रही थी. हम सभी एक -दूसरे का हाँथ पकडे आगे की ओर बढ़ते रहे. सारा पानी इन दो किमी में पीकर ख़तम कर दिया। एक जगह जाकर घोड़ेवाले मिल गए. उन्हें देखते ही हमारी बांछें खिल गयीं। फिर सबने माज़ा पिया और चढ़ गए अपनी-अपनी सवारी पर. 

                                     'शेषनाग झील' इस यात्रा का सबसे खूबसूरत मंज़र था. बहुत सारे यात्री यहाँ रुक रहे थे लेकिन हमारे पास समय कम था इसलिए हमनें घोड़े पर चलते-चलते ही यहाँ के नज़ारे किये। इसके दर्शन घूम-घूमकर लगभग आधे घंटे तक होते रहे. सुन्दर पहाड़, उस पर जमी चाँदी सी बरफ… और उसकी झील में पड़ती साफ़ परछाई, मानों शेषनाग के फन  की  भांति प्रतीत हो रही थी . यह स्थान समुद्रतल से ११७०० फीट ऊँचाई पर है. यहाँ ठहरने के लिए डाक-बंगले, और तम्बू तथा खाने के लिए भंडारे की व्यवस्था है. इस स्थान के बारे में भी एक कहानी प्रसिद्द है,…….शिव जी ने एक बार दानवों की पूजा-अर्चना से खुश होकर उन्हें वायु रूप ले लेने का आशीर्वाद दे दिया। अब दानव तो दानव ठहरे। उन्होंने देवताओं को परेशांन  करना शुरू कर दिया  दानवों से दुखी होकर उन्होंने शिव की आराधना की. शिव जी ने कहा कि मैंने ही आशीर्वाद दिया है अब मैं वापस कैसे ले सकता हूँ? आप सब विष्णु भगवान् के पास जाएँ। सभी देवता भगवान् विष्णु के पास पहुंचे और अपनी व्यथा बताई, तब उन्होंने शेषनाग से कहा कि 'आप तो वायु भक्षक हैं अतः इस वायुरूपी दैत्य का भक्षण करें और देवोँ को कष्ट हीन करें ''. शेषनाग ने उनके आदेश का पालन इसी स्थान पर किया था तब से इसका नाम ही शेषनाग झील पड़ गया .
                                           
                                    अगली चढ़ाई थी 'गणेश टॉप''…………यह पहले वाली से  भी कठिन थी . यहाँ हमारे अंजर-पंजर सब ढीले हो गए थे. यह एक सजा लग रही थी लेकिन शिवजी का नाम लेते-लेते हम घोड़े पर बैठे रहे. जो पैदल चल रहे थे वो रुक-रूककर आराम से २-३ दिन में पहुँचने वाले थे लेकिन एक विचार दिमाग में हमेशा से था कि पहाड़ के मौसम का कोई ठिकाना नहीं इसलिए यहाँ से जितनी जल्दी हो निकल लो. इसलिए हम थकान के बावजूद आगे बढे जा रहे थे. लगभग एक बजे अमरनाथ यात्रा का सबसे प्रमुख भंडारा आया, '' पौषपत्री'' का.  

                              ''पौषपत्री'' का भंडारा तो अपने आपमें एक मिसाल है . पहाड़ की उन ऊंचाइयों पर खाने-पीने की इतनी बढ़िया व्यवस्था पूरे हिन्दुस्तान के बड़े से बड़े केटरर को भी मात देती है. यहाँ जूस, फल, मेवे, खाने के तो ना जाने कितने प्रकार …पंजाबी,  गुजराती,  दछिन भारतीय, उत्तर भारतीय सबी जगह के खाने थे. मुरब्बों की तो क़तार लगी थी …. आंवला, गाजर, और जाने क्या-क्या . ड्राई फ्रूट की चाट हमनें पहली बार खाई. टिक्की, बताशे, दही-बड़े, चाउमीन, पाव-भाजी खाकर बच्चे तो मस्त हो गए. हमने भी रोस्टेड पनीर, मशरूम खाकर अपने टूटे शरीर को थोड़ी फुर्ती प्रदान की. बर्फियों की तो कतार थी … नारियल, गुड, लौकी, मूंगफली, खोये और  भी बहुत। रसमलाई, छेना-खीर, रसगुल्ला सब कुछ आकर्षित कर रहा था लेकिन पेट तो अपना ही था ना . हाँ, एक खास बात इन भंडारों में अवश्य थी कि वह जूठा कुछ भी नही छोड़ने दे रहे थे यदि कोई प्लेट में कुछ बचा हुआ dustbin में डाल रहा था तो अत्यंत ही विनम्रता के साथ उसे वह खिला  देते थे. इसलिए जब भी आप जाएँ , प्लेट में उतना ही लें जितना खतम कर  सकें। चलते समय सबको छोटी-छोटी पुड़ियों में ग्लूकोस और टाफी दी जा रही थी. लोग यहाँ सेवा कर रहे थे. जूठे बर्तन धोने की तो होड़ मची हुई थी. सभी इसे पुण्य मानते हैं. सच! पहाड़ की उस ऊँचाई पर ये व्यवस्था भक्तों और धर्मार्थियों के शिव प्रेम का सच्चा उदहारण है. 
                                         
                         इसके बाद लगातार डेढ़ घंटा सफ़र करने के बाद हम पहुंचे ''पंचतरनी''……ये रास्ता थोडा समतल था. यह समुद्रतल से १२००० फीट ऊँचाई पर है. कल-कल बहते झरने इस स्थान की शोभा को बढ़ाते हैं. दूर से ही दिखते रंग -बिरंगे टेंट, पानी में अठखेलियाँ करते युवक और इधर-उधर मंडराते घोड़ों को देखकर लग गया कि यहाँ लोग रूककर आराम अवश्य करते हैं. यहाँ पर भैरव पर्वत का स्पर्श करके गंगा की पांच धाराएं नीचे तक आती हैं इसलिए इसका नाम 'पञ्चतरनी'' पड़ा . अब शाम के ५ बज रहे थे इसलिए हमनें रात यहीं बिताने का मन बनाया। हमनें १० रजाई-गद्दों वाला एक टेंट किराए पर लिया और अपने बैग और जूते उतार ढेर हो गए . या अपने आपमें एक बेहतरीन अनुभव था. बचपन में किये गए NCC कैंप की याद ताज़ा हो आई. टेंट वाला काफी अच्छा व्यक्ति था. उसनें हमें गरम-गरम कहवा पिलाया। हमारी सारी थकान दूर हो गयी. लगभग २ घंटा आराम करने के बाद हम फिर वहां की रौनक देखने निकल पड़े. यहाँ का माहौल देखकर बचपन के  दशहरे के मेले की याद दिला  रहा था. चारों ओर बिजली की उत्तम व्यवस्था, उस पर से खुला  निरभ्र आकाश, उसमें टिमटिमाते असंख्य तारे, चमचमाता चाँद, दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और पीछे बहती गंगा … सच मानिए थकान के बावजूद लगा कि पंख  लगाकर पूरे इलाके का चक्कर काट आऊं. यहाँ भी कई भंडारे थे जिसमें खाने की उत्तम व्यवस्था थी. अचानक मुझे लखनऊ के 'C' ब्लाक राजाजीपुरम का भंडारा  दिख गया. मैं भागकर वहां पहुंची। इतनी बढ़िया मूंग की दाल, मिक्स सब्जी और रोटी खाकर मुझे मम्मी की याद आ गयी, मिठाई तो २ बार खाई. आखिर मेरे मायके का भंडारा  था भाई . हम हर जगह खाना खिलानेवालों और भंडारा लगानेवालों से मिलकर धन्यवाद जरूर करते थे यहाँ भी गए और अपना परिचय दिया। वो मुझे पहचान गए, मेरी आँख भर आई. उस रात हम छककर  सोये . ऐसी नींद तो मखमल के बिछौने पर भी ना आती जो वहां पहाड़ी पर बिछे बिस्तर पर आई. सुबह चार बजे से ही रौनक लगनी शुरू हो गयी थी. टेंटवाले ने चूल्हा जला  रखा था जिस पर लगातार पानी गरम हो रहा था. एक बोतल पानी १० रु और एक बाल्टी ५० रु.में मिल रही थी,  यहाँ पर teensheet के temporary toilets की व्यवस्था थी. हम सभी फ्रेश होकर नहाकर तैयार हो ५ बजे फिर से घोड़े पर सवार हो गए. 

                                                         अब  हमारा लक्ष्य पास ही था, यानी पवित्र गुफा हमसे बस ६ किमी दूर थी . लेकिन यह रास्ता काफी पथरीला और ऊबड़-खाबड़ था. लगातार ३ घंटे के सफ़र के बाद हम बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा के पास पहुँच गए. यह स्थान समुद्रतल से १२७२९ फीट ऊँचाई पर स्थित है . एक दूकान पर सारा सामान रख , प्रसाद ले अब हम पैदल आगे बढे.   बाबा बर्फानी की गुफा सामने ही दिख रही थी लेकिन रास्ता बहुत ही कठिन था नीचे पानी, बगल में बरफ, चारों तरफ पत्थर ही पत्थर और दूर से दिख रही भक्तों की लाइन। यहाँ से गुफा तक का रास्ता लगभग १ किमी था. चूँकि पालकीवालों के लिए दर्शन की अलग लाइन लगती है इसलिए बच्चों की सुविधा  की दृष्टि से हम सबने पालकी कर ली और कुछ ही मिनटों में बिलकुल गुफा के नज़दीक पहुँच गए. हम सब अब भाव-विभोर थे. जिन पवित्र  हिमलिंग के दर्शन हेतु इतना लम्बा सफ़र तय करके आये थे अब हम उनके सामने थे, आँख में अश्रु और मन पुलकित। दाहिनी ओर शिवलिंग और सामने गणेशजी  और माता पार्वती। सब कुछ अद्भुत। इस उम्र तक जो बस फोटो में देखा था आज साछात सामने देख रोमांचित थे. दर्शन कर मन ही मन पूजा कर, सबका दिया चढ़ावा चढ़ा, प्रसाद ले, ख़ुशी-ख़ुशी सीढियाँ उतर रहे थे की सामने खीर का प्रसाद मिल रहा था. शिवजी के चरणों का स्पर्श करती हुई अमर गंगा का जल ले हम वापस चल पड़े . यहाँ भी भक्त जनों के खाने-पीने और रहने की कोई दिक्कत नहीं। सबकी सुविधा है . हम भी कढी-चावल खाकर, दुबारा से घोड़े करकर बालटाल के रास्ते से उतर आये. यह रास्ता अत्यंत ही धूल से भरा है इसलिए हम सभी अपने आपको पूरा कवर करे हुए थे. यह रास्ता छोटा है अतः हम लगभग ४ घंटे लगातार चलते हुए नीचे आ गए . सारे रास्ते सेना के जवान पानी और दवाइयों के साथ मौजूद थे. ठन्डे पानी से बीमार होने का खतरा होता इसलिए वो सबको गरम पानी पिला रहे थे. इस तरह हमारी अमरनाथ की यात्रा संपन्न हुई. कहते हैं कि कलियुग में अमरनाथ जी के दर्शन के सामान भक्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं। नीचे टैक्सी स्टैंड पर हमारी 'ट्रेवलर' हमारा इंतज़ार कर रही थी अतः हम सभी बाबा बर्फानी की जय बोलते हुए वापस गाडी पर बैठे और चल पड़े अपने अगले पड़ाव की ओर……. 

                                   . . . डॉ रागिनी मिश्र …

                                            

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

कब तक होता रहेगा नारी का अपमान?

आज एक बार फिर अपने स्त्री होने पर बहुत गुस्सा और दुःख हुआ। हुआ यूँ कि; आज सुबह करीब ६ बजे अपनी कॉलोनी के पार्क में सैर कर रही थी, उस समय हम दो औरतें ही पार्क में चक्कर लगा रहे थे। अचानक एक लड़के ने पार्क बाहर एक कोने पर अपनी लाल रंग की 'activa' खड़ी करी और बाहर ही चक्कर लगाने लगा। उसकी उम्र कोई २०  या २ २ साल की रही होगी। हम लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और अपनी exercise में लगे रहे।  वहीँ पर एक कोचिंग भी है जिसमे ५. ३ ० बजे से ही बच्चे पढने आने लगते हैं . मैंने भी उसे एक स्टूडेंट ही समझा। वह पार्क से बाहर लटक रही डाली से फूल तोड़कर पन्नी में रख रहा था। चक्कर लगाने के दौरान  जैसे ही पार्क के उस कोने पर मैं पहुँची जिधर बाहर वह खड़ा हुआ था कि  अचानक उसने बाहर से ही अपने को 'मर्द' कहलाने  वाले अंग से अश्लील हरकत करना शुरू कर दिया और बहुत ही गंदे शब्दों में कुछ इंगित किया। एक पल को तो मानों मेरे शरीर का सारा खून जम गया और मैं धरती से चिपक सी गयी, लेकिन अगले ही पल मेरा 'चंडी' रूप जाग गया और मैं  चिल्लाती हुई और लगभग दौड़ती हुई उसके पास पहुँची कि  वह activa  स्टार्ट कर भाग गया। वह आज मेरे हाँथ आने से रह गया। उसको पीट लेती तो शायद यह न लिखती लेकिन ....एक मलाल लिए मैं घर तो लौट आई, सबको पूरा वाकया बताया, अपने लड़को को नसीहत भी दी लेकिन एक आक्रोश इस समय तक बरकरार है। यहाँ तक कि  आज मैं पूजा भी ढंग से न कर पाई  और देवी माँ  की फोटो सामने होने के बावजूद बार-बार उस लड़के का चेहरा और उसका फूल तोड़ता हाँथ और फिर उन्ही हांथों से .....................उसका इशारा। हे देवी माँ! अब तो शांत ना रहो, ऐसे समाज के दुश्मनों को कुछ तो सबक सिखाओ।  आज फिर से याद आ रहा है दामिनी का वह वाक्य ,''उन दरिंदों को जिन्दा जला देना'......अगर अब भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया तो ऐसे गंदे लोगों के हौंसले बुलंद होते ही रहेंगे और समाज में किसी की भी माँ -बहन -बेटी सुरछित और सम्मानित नहीं रह सकेंगी।http://www.blogger.com/blogger.g?blogID=2116586550283842629#editor/target=post;postID=2168194854809558345
                               
                   ..........................  डॉ . रागिनी मिश्र ......................

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

प्यार, इश्क, मुहब्बत ......

अधूरे हर्फ़ 
प्यार,
इश्क,
मुहब्बत ......

अधूरा प्रेम 
लैला,
हीर,
सोहिनी .......

अधूरी जिंदगी 
मँजनू,
राँझा,
महिवाल ......

सब अधूरा 
परन्तु; 
छाप 
अमिट ......


ना मिले; 
मीरा 
और 
कृष्ण भी तो ......

परन्तु; 
पूर्ण प्रेम,
पूर्ण 
एकात्मकता ......

ना हुये; 
कान्हा भी तो 
राधा  
के  .........

परन्तु; 
जीवंत 
अद्यतन; वह 
प्रेम, वह पूर्णता .. .....

क्योंकि; 
प्रेम नहीं 
कभी भी 
अधूरा .......

करता वह 
परिपूर्ण; 
समस्त 
भावनाओं से .....


पढ़ाता,
मनुजता का 
पाठ 
सबको ......






....................................डॉ . रागिनी मिश्र ................




रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मेरा मस्त मनोहारी वैलेंटाइन सप्ताह

वैलेंटाइन सप्ताह  चल रहा है। रोज़ ही नए -नए सन्देश फेसबुक पर चस्पा हो रहे हैं। मैंने भी अबकी सोचा, चलो कुछ किया जाए। तो बस हम दोनों घूमने निकल पड़े। यूँ ही सड़के नापते-नापते पहुंच गए लखनऊ के मोहन रोड स्थित 'स्पर्श'.....नेत्रहीनों के विद्यालय। class 1st  से 12th  वाले, लगभग 100 छात्रों की संख्या वाले इस सरकारी विद्यालय में N.S.S. का कैंप चल रहा था और बच्चे संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे। दूर से सुनने पर ऐसा लगा मानों कोई बढ़िया recording बज रही है लेकिन वह live  performance थी और वह  भी नेत्रहीन; छोटे-छोटे बच्चों की। इतना बढ़िया संगीत का ज्ञान, वाद्य-यंत्रों की सूझ ....मन सम्मोहित हो गया मानों। कार्यक्रम के बाद उनसे बात की। बहुत अच्छा  लगा। शाम होने लगी थी। उनको अपने हॉस्टल जाना था लेकिन हम उनके साथ और समय बिताना चाहते थे। उनके साथ मस्ती करना चाहते थे। बच्चे भी हम जैसे मस्त-मौला लोगों से मिलकर खुश हो गए। तो हमने, बच्चो तथा उनके वार्डन ने मिलकर तय किया कि  sunday का लंच हम साथ करेंगे।  उनका लंच का समय और हमारे breakfast का समय एक ही .....यानि उन बच्चों को 24 घंटे में सिर्फ दो बार खाने को मिलता था सुबह 8.30 और रात को 8.00 बजे। मन द्रवित हो उठा। उन बच्चों से उनकी पसंद पूछकर वार्डन से अनुमति लेकर sunday को उनका लंच हमने करवाने का निर्णय लिया। सारा राशन शनिवार को पहुँचा दिया और आज सुबह-सुबह हम भी पहुँच गए। उनका रसोइया पाक-कला में बहुत ही निपुण था। खाना उसने बहुत ही अच्छा बनाया  था। बच्चे इतने अनुशासित; कि मन आनंदित हो उठा। दो दिन पहले हुई एक घंटे की मुलाकात से ही उन्होंने हमें हमारी एक आवाज़ से पहचान लिया। उन्होंने खाने से पहले हमारे लिए एक संगीत का छोटा सा आयोजन कर डाला। हम उनके इस भाव से बिक गए उनके हांथों। हमारे बच्चे होते और खाने की खुशबू उनके नाक में जा रही होती तो वो क्या इस तरह हमारे लिए कुछ सोचते? बस, मन में यही भाव आ गया। प्रभु जब एक इंद्रिय छीन लेता है तो उसके स्थान पर बहुत कुछ नवाज़ देता है, आज उन बच्चों को देखकर इस बात का यकीन हो गया। मोबाइल पर उनकी उँगलियाँ कुछ इस तरह चल रही थी मानों बहुत सुन्दर नृत्य चल रहा हो। सारे नंबर याद भी थे और वह बड़े ही आराम से उसे डायल भी कर रहे थे, मेरे पूछने पर उसने बड़े ही आराम से कांटेक्ट लिस्ट में से सर्च करके भी दिखा दिया। हम सभी आश्चर्यचकित।


मोबाइल में नंबर निकालते आजम 
कपडे और जूते चमकाते रमेश, कमल और एक अन्य बच्चा 
विवेकजी से बात करते बच्चे 

क्लास 10th का 'आजम', प्यार का नाम 'अमन'.... उससे मिलकर लगा जैसे  oxford के student से बात कर रहे हों। इतनी बढ़िया अमेरिकन स्टाइल और परफेक्ट ग्रामर के साथ english में बात कर रहा था कि बस। मुझे लगा इस सरकारी स्कूल में ऐसा कैसे संभव है? उसने बताया कि मोबाइल पर नेट के थ्रू lessons से उसने सुन-सुनकर सीखा। और क्लास 11th का  'अनुज', वह तो जैसे पूरे स्कूल की जान हो। उसके बिना कोई काम नहीं चल सकता। पढने में अव्वल, क्रिकेट में चैंपियन, गीत-संगीत में महारथी। इतने सहज भाव से योग करके उसने दिखाया जैसे कोई सामान्य व्यक्ति  हमें सिख रहा हो और हमारे चेहरे के भाव भी देख रहा हो। रमेश  अपने कपडे के जूते नल पर धो रहा था और कमल  अपनी शर्ट। वह अपनी शर्ट पर की गंदगी अपने उँगलियों से महसूस करके उस पर साबुन लगा रहा था और उसको रगड़ रहा था, रमेश कह रहा था, ''कल field  में मेरे जूते ही चमक मारेंगे' ....कमल हँसते हुए कह रहा था, ''अबे! मेरी शर्ट सबसे ज्यादा चमकेगी, कितना मस्त धो रहा हूँ ''......सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ गए कि जिन बच्चों ने जीवन में कभी चमक नहीं देखी  वह कपड़ो और जूतों को चमका  रहे हैं और कितना खुश हैं। सलाम किया उनके आत्मविश्वास  को। सभी बच्चों ने खाने से पहले हमें thanks बोल और अत्यंत अनुशासित ढंग से खाने के लिए बैठ गए। हमने उन्हें अपने हांथों से परसकर खाना खिलाया। उनके तृप्त भाव को देखकर मन अत्यंत गदगद हो उठा था। उन सबको खिलाकर हमने भी वहीँ उनके साथ ही खाया। उनके वार्डन 'पांडेयजी' अत्यन्त मधुरभाषी और व्यवहारकुशल व्यक्ति थे . बच्चों के साथ उनका सम्बन्ध बिलकुल माँ -बेटे की भांति ही दिखा।
वार्डन 'पांडेयजी'
अनुशासित ढंग से खाना खाते नेत्रहीन बच्चे 



'अनुज',  'आजम'  और मैं 
हम पति-पत्नी दोनों ही बहुत खुश थे। घर लौटना भी जरूरी था तो उनसे विदा लेकर और जल्दी ही मिलने का वादा करके हम खुश-ख़ुशी घर लौट आये। आज पहली बार लगा कि 'वैलेंटाइन सप्ताह' की शुरुआत हो गयी।